Thursday, June 28, 2012

अंदाज ए मेरा: भारत के नक्‍शे में करांची और पाकिस्‍तान...

अंदाज ए मेरा: भारत के नक्‍शे में करांची और पाकिस्‍तान...: सरबजीत सिंह एक पुरानी कहावत है, चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी से न जाए। पाकिस्तान का भी यही हाल है। किसी समय भारत की दया पर जिंदा रहने और ...

Monday, June 25, 2012

खबरगंगा: देश को रसातल में ले जाने की तैयारी


आज के एक अखबार की लीड खबर का शीर्षक है 'कड़े तेवर दिखायेंगे पीएम'. उप शीर्षक है 'पेट्रोल सस्ता कर डीजल महंगा करने की तैयारी' 
संप्रंग सर्कार कठोर फैसले लेने का यह बेहतर मौका मान रही है. अर्थात वह हमेशा ऐसे लेने के लिए मौके की ताक में रहती है जिससे आम आदमी का जीवन और कष्टमय हो जाए. उस आम आदमी का जिसके लिए प्रतिदिन 28  रुपये के खर्च करने की क्षमता को काफी मान रही है यह सरकार. क्योंकि इसी में आबादी के उस हिस्से की भलाई है जिसके बाथरूम की मरम्मत के लिए 35  लाख रुपये भी कम पड़ते हैं. देश का एक बच्चा भी जानता है की तमाम जिंसों की ढुलाई डीजल चालित वाहनों से होता है. डीजल को महंगा करने से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें कैसे कम होंगी कम से कम हमारे जैसे मंद बुद्धि के लोगों की समझ से बाहर है. पीएम अर्थशास्त्री हैं. हो सकता है उनके अर्थशास्त्र में ऐसा कोई गणित हो. या फिर यह भी हो सकता है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का यह सिद्धांत कि अपने चरम पर पहुंचकर हर चीज विलीन हो जाती है काम कर रहा हो. सरकार को यकीन हो कि महंगाई को उसके चरम तक पहुंचा दो वह खुद ही ख़त्म हो जायेगी.
पेट्रोल की कीमत घटने से एलिट क्लास के उन लोगों को राहत मिलेगी.जिनके पास धन है. जिनकी क्रयशक्ति बेहतर है. लेकिन डीजल की कीमत बढ़ने पर निम्न मध्यवर्ग और मजदूर-किसान यानी हर वर्ग के लोग प्रभावित होंगे. इसी तरह रसोई गैस की राशनिंग जैसे कड़े कदम उठाने की तैयारी हो रही है. बाकी कड़े फैसले भी जनता पर कहर ढानेवाले ही हैं. अब भारत की जनता पांच वर्ष के लिए सत्ता की बागडोर थमाने की भूल कर ही बैठी है तो भुगतना तो उसी को पड़ेगा. इसलिए जनाब! आप चिंता मत कीजिये. जो मर्जी हो कर लीजिये. पूरी आबादी का गला घोंट दीजिये. लेकिन भगवान के लिए कुछ तो शर्म कीजिये आखिर आप 2014  में जनता को क्या मुंह दिखायेंगे.  

----देवेंद्र गौतम  

खबरगंगा: देश को रसातल में ले जाने की तैयारी:

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Sunday, June 24, 2012

वेब मीडिया को स्वावलंबी बनाने की जरूरत | युग - ज़माना

Saturday, June 23, 2012

Dr. Anwer Jamal Khan' s Ved Quran फ़ीचर्ड जागरण ब्लॉग

Thursday, June 21, 2012

नीतीश या मोदी ?

बता रहे हैं -

बड़ा खिलाड़ी कौन, नीतीश या मोदी ?

मंडल आंदोलन के सबसे फिनिश प्रॉडक्ट माने जाने वाले नीतीश कुमार सही समय पर सही चाल चलने के लिए जाने जाते हैं। इसलिए जब पिछले सप्ताह 14 जून को अपनी पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में पहली बार उन्होंने कहा था कि एनडीए की ओर से उन्हें सेक्युलर छवि वाला शख्स ही पीएम के दावेदार के रूप में कबूल होगा पढ़ें खबर। तभी साफ हो गया था कि एनडीए में अब एक बड़ा घमासान छिड़ने वाला है। बिना नाम लिए उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की दावेदारी खारिज की थी और परोक्ष रूप से अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर दी थी। नीतीश ने पहली बार यह बात पटना में कही थी। क्षेत्रीय अखबारों में इसकी चर्चा भर हुई और दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ी। जाहिर है जिस बहस को नीतीश छेड़ना चाहते थे, वह जोर नहीं पकड़ पाई। इसलिए उन्होंने बेहतर मीडिया मैनेजमेंट के साथ दोबारा वही बात दोहराई और उसके बाद जो बहस शुरू हुई है, वह थमने का नाम नहीं ले रही है।
 
नरेंद्र मोदी के नाम पर सार्वजिनक रूप से नीतीश का नाक-भौंह सिकोड़ना नई बात नहीं है। लेकिन, आम चुनाव से दो साल पहले पीएम की दावेदारी को तूल देना बड़े फलक पर छाने की उनकी तैयारी को दिखाता है। याद कीजिए, 2002 फरवरी में जब गुजरात दंगा हुआ तब नीतीश कुमार बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में रेल मंत्री थे और किसी ने शायद ही सुना हो कि उन्होंने इसके विरोध में सार्वजनिक रूप एक भी शब्द बोला है। उस समय एक ही मंत्री रामविलास पासवान ने कथित रूप से इसके विरोध में सरकार से इस्तीफा दिया था, लेकिन उसकी भी असली वजह यह थी कि उनसे संचार मंत्रालय ले लिया गया था। इस वजह से वह नाराज थे और गुजरात दंगे ने शहादत देने के लिए उन्हें मुफीद मौका मुहैया करा दिया।
 
भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता वह दुधारू गाय है, जिसे हर नेता अपने फायदे के लिए दुहने की फिराक में रहता है। असल में बिना किसी अपवाद के किसी भी नेता और पार्टी को धर्मनिरपेक्षता से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है।

Monday, June 18, 2012

प्यार खेल है बदकारों के लिए 3 Ladies 1 Boy

पल्लवी सक्सेना जी बता रही हैं एक सच्ची घटना 

करे कोई भरे कोई ... 

कल की ही बात है मेरे शहर भोपाल में मेरे घर के पास एक दवाई की दुकान है जिसे एक पिता पुत्र  मिलकर चलाते थे ,उन अंकल से अर्थात दुकान के मालिक की मेरे पापा के साथ बहुत अच्छी दोस्ती हो गयी थी। कल अचानक पता चला कि उनके 22 साल के लड़के ने आत्महत्या कर ली। जानकार बेहद अफसोस हुआ। इस सारे मामले के पीछे की जो कहानी मेरे पापा को उन्होंने जो सुनाई और मेरे पापा ने जो मुझे बताया वही आपके सामने रख रही हूँ।

हुआ यूं कि उनका बेटा न जाने कैसे एक-के बाद एक कुछ स्त्रियों के चक्कर में फंस गया उसकी ज़िंदगी में आने वाली तीनों लड़कियों में से दो ने उसे प्यार में धोखा दिया तीसरी बार एक महिला जो खुद 2 बच्चों की माँ थी उसने उसके साथ सहानभूति रखते हुए संबंध बनाए और एक दिन हद पार हो जाने के बाद उसका वीडियो बना कर उस लड़के को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। बदले में मांगी 5 लाख रुपये की धनराशि, एक दिन पुत्र ने पिता के पास आकर कहा पापा मुझे 5 लाख रूपय चाहिए पिता ने कहा 5 क्या तुम 7 लाख ले लेना, मगर पहले कारण तो बताओ कि आखिर तुमको इतने पैसे क्यूँ चाहिए। तब उसने अपने पापा को सारी सच्चाई बताई अब इतने सारे पैसे आज की तारीख में कोई घर में तो रखता नहीं है सो पिता ने कहा ठीक है मुझे दो-तीन दिन का वक्त दो मैं कुछ इंतजाम करता हूँ और मन ही मन  उन्होंने सोचा इस बहाने एक दो दिन सोचने का भी समय मिल जायेगा कि इस मामले में और क्या किया जा सकता है, मगर हाय रे यह आजकल की नासबरी जनरेशन उसने उस औरत और उसके पति के दवारा दी हुई धमकियों के डर से अगले दिन ही आत्महत्या कर ली, उन अंकल के एक बेटी भी है जिसकी शादी हो चुकी है कल तक बेटा भी था जो अब नहीं रहा। ऐसे में वो बहुत टूट गए हैं उनका कहना है अब मैं कमाऊँ तो किसके लिए अब कमाई की न तो बहुत जरूरत है न कोई अरमान, ऊपर से उनकी दुकान पर आने वाले लोग उनसे मुंह छुपाकर किन्तु उन्हीं के सामने उनके बेटे के लिए अभद्र बातें करते है जिसके चलते अंकल से सहा नहीं जाता और वो दुकान बंद करके कहीं एकांत में जाकर बहुत रोते हैं।

  1. जिसने ख़ता की वह आत्महत्या करके मर गया लेकिन जिस औरत ने उसे ब्लेकमेल किया उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई ज़रूर करनी चाहिए हालाँकि उसके जुर्म को साबित कर पाना बड़ा मुश्किल है.
    बच्चे आत्महत्या न करें इसके लिए माँ बाप को बचपन से ही उनके सामने उन लोगों का चरित्र नहीं आने देना चाहिए जिन्होंने समस्या पड़ने पर खुद आत्महत्या कर ली.
    जिन लोगों ने आत्महत्या की है उन्हें कभी आदर्श बनाकर पेश न किया जाए. गलत लोगों को आदर्श बनाया जायेगा तो बच्चे उनके रास्ते पर चल सकते हैं.
    एक सच्चे आदर्श व्यक्ति का अनुसरण किये बिना समाज का दुःख कम होने वाला नहीं है.


    युवक के पिता के साथ हमारी संवेदनाएं हैं. 

Sunday, June 17, 2012

सोने पे सुहागा: अपने माँ-बाप के प्रति कृतज्ञ हो

सोने पे सुहागा: अपने माँ-बाप के प्रति कृतज्ञ हो
याद करो जब लुकमान ने अपने बेटे से, उसे नसीहत करते हुए कहा, "ऐ मेरे बेटे! अल्लाह का साझी न ठहराना। निश्चय ही शिर्क (बहुदेववाद) बहुत बड़ा ज़ुल्म है।" (13) और हमने मनुष्य को उसके अपने माँ-बाप के मामले में ताकीद की है - उसकी माँ ने निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे - कि "मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है (14) किन्तु यदि वे तुझपर दबाव डाले कि तू किसी को मेरे साथ साझी ठहराए, जिसका तुझे ज्ञान नहीं, तो उसकी बात न मानना और दुनिया में उसके साथ भले तरीके से रहना। किन्तु अनुसरण उस व्यक्ति के मार्ग का करना जो मेरी ओर रुजू हो। फिर तुम सबको मेरी ही ओर पलटना है; फिर मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुम करते रहे होगे।"- (15) 
-क़ुरआन,

ग़ज़लगंगा.dg: रिश्तों की पहचान अधूरी होती है

रिश्तों की पहचान अधूरी होती है.
जितनी कुर्बत उतनी दूरी होती है.

पहले खुली हवा में पौधे उगते थे 
अब बरगद की छांव जरूरी होती है.

लाख यहां मन्नत मांगो, मत्था टेको 
आस यहां  पर किसकी पूरी होती है.

खाली हाथ कहीं कुछ काम नहीं बनता 
हर दफ्तर की कुछ दस्तूरी होती है.

किसको नटवरलाल कहें इस दुनिया में 
जाने किसकी क्या मजबूरी होती है.

उनका एक लम्हा कटता है जितने में 
अपनी दिनभर की मजदूरी होती है.

-----देवेंद्र गौतम 

ग़ज़लगंगा.dg: रिश्तों की पहचान अधूरी होती है:

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Saturday, June 16, 2012

अंदाज ए मेरा: शीर्षक सुझाएं.....

अंदाज ए मेरा: शीर्षक सुझाएं.....: कुछ दिनो पूर्व एक अखबार के शीर्षक और इसे लेकर फेसबुक पर चली लंबी बहस ने काफी कुछ सोचने मजबूर किया। अखबार में एक खबर का फालोअप था और शीर्ष...

मासिक धर्म और परंपरा Masik dharm

रंजीत कुमार अपने ब्लॉग 'दो पाटन के बीच' पर बता रहे हैं कि

बाबुल तेरे देश में

नेपाल के सुनसरी जिले के एक गाँव की इस लड़की को इस्सलिये अपने घर से घरनिकाला दे दिया गया क्योंकि यह ऋतुस्रावा  थी . गाँव के लोगों का कहना है कि मासिक स्राव के दौरान लडकी अशुद्ध  होती है इसलिए उसे घर में न रहने का अधिकार है न खाने का और न सोने का.
Source : http://www.koshimani.blogspot.in/2008/06/blog-post_24.html
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ताज़ा  ख़बर (एक टिप्पणी , 28 फ़रवरी 2013)
चर्चामंच पर इस पोस्ट का लिंक दिया गया है-
संगम" (चर्चा मंच-912)

चर्चामंच के कारण ही हम इस पोस्ट तक पहुंच सके। चर्चामंच ख़ुद इस तरह के लिंक देता है और अगर ऐसे लिंक दूसरा दे तो चर्चामंच के निर्माता और चर्चाकार ऐतराज़ जताते हैं। उनके ऐतराज़ देखिए एक ऐसी ही पोस्ट के लिंक देने पर। नीचे दिए गए शीर्षक को क्लिक कीजिए-
अंतिम संस्कार के रीति रिवाज की जानकारी दे रही हैं Shagun Gupta
बुद्धिजीवियों का यह व्यवहार विचित्र भी है और निराशाजनक भी। 

Friday, June 15, 2012

समस्या का समाधान Wrong is wrong


सारी समस्याओं का समाधान पार्ट 1 Solution for every problem


हमारे सामने आज बहुत सी समस्याएं हैं। हरेक समस्या एक आंदोलन की ज़रूरत बताती है। जिन समस्याओं के लिए आज आंदोलन चलाने की ज़रूरत है। उनकी लिस्ट बनाई जाए तो वह लिस्ट इतनी लंबी हो जाती है कि उसे पढ़ना ही मुश्किल हो जाता है। देखिए एक लिस्ट, जो हमने बनाई है। इसमें आप भी कुछ समस्याओं की ओर ध्यान दिला सकते हैं, जिनके लिए हमें आंदोलन ज़रूरत है।
http://powerfulislamicquotes.tumblr.com/

70 समस्याएं 
ज़रा सोचिए
इतनी सारी समस्याएं हैं और इन सबके लिए सैकड़ों आंदोलन चलाने की ज़रूरत है।
क्या कोई एक आदमी इन सभी आंदोलनों में हिस्सा ले सकता है ?
अगर इन समस्याओं के ख़ात्मे के लिए आंदोलन चलाना संभव नहीं है तो फिर इन सबसे मुक्ति कैसे संभव है ?

fact n figure: Podcasting Monetization Strategies for Marketers

By: Rok Hrastnik

With the growing popularity of podcasting, publishers and marketers around the world are asking themselves how to monetize this content channel.
Today we'll be taking a look at how marketers can monetize podcasting through enhanced marketing activities.
While publishers might find it relatively easy to integrate podcasting in to their business models without really "creating a revolution", the opportunities for marketers really go beyond traditional marketing tactics.
To understand the opportunity we need to understand what podcasting brings to the marketing table: the power of voice, delivered directly to our prospects, customers, employees and partners.
While text might still be the most "usable" format and the easiest to consume, voice itself has the unique feature of being able to express emotion and bring personality in to marketing communications.
For marketers, monetizing podcasting won't come through ad sales or content sales, but through opportunities to enhance their marketing communications with the power of emotion, delivered directly to their recipients.
 (click and read more)

Thursday, June 14, 2012

fact n figure: कुफ्र टूटा खुदा-खुदा कर के


25 गैस सिलिंडरों के फटने की घटना को छोड़ दें तो ब्रह्मेश्वर मुखिया का श्राद्धकर्म शांति पूर्वक संपन्न हो गया. 13 जून को इस मौके पर दर्जनों सांसद, विधायक और अन्य जन प्रतिनिधि श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे. इससे पता चलता है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया भले ही एक प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन रणवीर सेना के संस्थापक थे लेकिन राजनीतिज्ञों के बीच उनकी अच्छी पैठ थी. वर्ष 2002 में नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी से पूर्व उन्हें चेहरे से उनके बहुत करीबी लोग ही पहचानते थे. निश्चित रूप से उनमें सत्ता की राजनीति के खिलाडियों की अच्छी तादाद थी. यह राजनैतिक संपर्क जेल में तो नहीं ही बने होंगे.जाहिर है कि नक्सल विरोध इसका मूल तत्व रहा होगा. अगड़ी जातियों के मतों का आकर्षण भी प्रेरक रहा होगा. यदि नहीं तो क्या किसी नक्सली नेता की मृत्यु पर भी श्रद्धांजलि देने के लिए ये जन  प्रतिनिधि जायेंगे?
रणवीर सेना सामंतों और बड़े किसानों के हित में नक्सलियों के साथ हिंसक युद्ध के लिए बनी निजी सेना थी. इसमें मुख्यतः भूमिहार जाति के लोग थे. नक्सलियों से लड़ने के लिए इससे पूर्व बिहार में राजपूतों की कुंवर सेना, सनलाईट सेना, ब्राह्मणों की आज़ाद सेना,  कुर्मियों की भूमि सेना जैसी कई सेनाएं बन चुकी थीं. लेकिन वे नक्सलियों से लड़कर मृतप्राय हो चुकी थीं. रणवीर सेना सबसे अंत में बनी और दर्जनों जनसंहारों को अंजाम देकर अगड़ी जातियों की हितैषी खूंखार संस्था के रूप में चर्चित हो चुकी थी. हालांकि इस सेना ने आमने सामने की लड़ाई से हमेशा परहेज़ किया. हरिजनों को नक्सली मान कर अचानक हमले में उनका संहार करना इसकी मुख्य कार्यशैली थी. चाहे वह गांव नक्सल समर्थक हो अथवा नहीं. कहते हैं कि मियांपुर जनसंहार के बाद ब्रह्मेश्वर मुखिया को यह पता चला कि भूमिहारों पर हमला करने वाले नक्सली हरिजन नहीं बल्कि यादव हैं. ब्रह्मेश्वर मुखिया ने पटना में अचानक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर घोषित किया था कि अब उनकी लड़ाई हरिजनों से नहीं यादवों से है. इस वक्तव्य के बाद लालू प्रसाद सबसे ज्यादा परेशां हुए थे. उन्होंने मुखिया के साथ गुप्त बैठक कर भूमिहार और यादव जाति के बीच इस संभावित जंग को रोक दिया था. इसके बाद से ही बिहार में जनसंहारों का सिलसिला थमा था. वर्ग संधर्ष के नाम पर जातीय युद्ध का एक लम्बा दौर चला था.

---देवेंद्र गौतम
fact n figure: कुफ्र टूटा खुदा-खुदा कर के:

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Tuesday, June 12, 2012

महिलाओं के शवों का पोस्ट मॉर्टम केवल महिला डाक्टर के द्वारा किया जाए

आज के युग में यदि किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हो जाती है तो मौत के कारण का पता लगाने के लिये उसके शव का पोस्ट मॉर्टम किया जाता है। पोस्ट मॉर्टम लाश को नंगा किये बिना करना सम्भव नहीं है बल्कि शरीर पर किसी चोट, ज़हरीली सुई आदि के निशान का पता लगाने के लिए ज़रूरी है कि डाक्टर उसके प्रत्येक अंग का बारीकी से अवलोकन करे। यदि लाश किसी स्त्री की है तो डाक्टर के लिए यह पता लगाना ज़रूरी होता है कि मृतका के साथ सम्भोग तो नहीं किया गया है जिसके लिए उसके शरीर में किसी भी औज़ार के दाख़िल कराए जाने की ज़रूरत को नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता। जीवित रहते हुए जिस महिला को अपराधी होने के बावजूद भी पुरुष पुलिस के द्वारा पकड़े जाने तक को बरदाश्त नहीं किया जाता और सरकार द्वारा भी महिला पुलिस उपलब्ध कराई जाती है तो फिर मरने के बाद पोस्ट मॉर्टम की आवश्यकता पड़ने पर महिला डाक्टर की सेवा क्यों नहीं ली जाती और पुरुष डाक्टर के सामने उसको बेपर्दा करने के लिये छोड़े जाने का क्या औचित्य है?
 इसके अतिरिक्त एक बात यह है कि अन्तिम संस्कार के लिए मुर्दे को यदि दूसरे सामान की तरह ले जाया जाय तो उसको न तो चोट लगने का डर होगा और न ही टूट फूट का अन्देशा परन्तु ऐसा न करके उसको कन्धों पर उठा कर सम्मान पूर्वक ले जाए जाने की परम्परा का होना मुर्दे के प्रति आदर भाव को प्रदर्शित करता है। परन्तु पोस्ट मॉर्टम की प्रक्रिया में शव की जिस प्रकार से दुर्गति होती है उसके कारण अक्सर लोग शव का पोस्ट मॉर्टम कराने से बचते हैं चाहे मौत की गुत्थी अन सुलझी ही क्यों न रह जाए।
 बुद्धिजीवी वर्ग को चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमतानुसार व्यक्गित अथवा संस्थागत रूप से सरकार को इस बात के लिए आमादा करने की कोशिश करे कि पोस्ट मॉर्टम किये जाने वाले शवों की दुर्गति न की जाए और महिलाओं के शवों का पोस्ट मॉर्टम केवल महिला डाक्टर के द्वारा कराया जाना सुनिश्चित किया जाए।
देखें -
Haqnama


ग़ज़लगंगा.dg: मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.

मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.
भवंर में फंसा हूं मुझे पार कर दे.

जिसे जिंदगी ने कहीं का न छोड़ा
उसे जिंदगी का तलबगार कर दे.

कई बार लौटा हूं उसकी गली से
कहीं मुझसे मिलने से इनकार कर दे!

कभी दोस्ती की रवायत निभाए
कभी वो पलटकर पलटवार कर दे.

कोई मेरी छत के करे चार टुकड़े 
कोई मेरे आंगन में दीवार कर दे.

मैं क्या उसको समझूं, मैं क्या उसको जानूं 
मेरा हक भी जो मुझको थक-हार कर दे.

वो है या नहीं है, नहीं है कि है 
यही सोच मुझको न बीमार कर दे.

----देवेंद्र गौतम 


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Monday, June 11, 2012

अंदाज ए मेरा: लोकतंत्र का मजाक!

अंदाज ए मेरा: लोकतंत्र का मजाक!:  यह लोकतंत्र का कौन सा चेहरा है ? लोकतंत्र में बहुदलीय प्रणाली की व्यवस्था है। अलग-अलग दलों के लोग चुनाव मैदान में होते हैं और उनमें से जनता...

Sunday, June 10, 2012

विधवाओं के पुनर्वास की व्यवस्था क्या हो ?

सत्यम शिवम जी के लेख 

चार शादियाँ और इस्लामी तर्क

पर हमने कहा - 


4 औरतों से विवाह अनिवार्य नहीं है . पैगंबर साहब स. के ज़माने में जब युद्ध में मुसलमान मारे गये तो विधवा औरतों और उनकी बेसहारा लड़कियों को सहारा देने के लिए यह व्यवस्था दी गयी थी.
जो लोग यह इल्ज़ाम लगाते हैं कि मुसलमान चार चार शादियां करते हैं. वे भी देख सकते हैं कि हमारे न तो 4 बीवियां हैं, न 3 और न ही 2 और यही हाल हमारे दोस्तों का है. हमारा ही नहीं बल्कि यही हाल इस्लाम के आलिमों का है. हिंदुस्तान भर के छोटे-बड़े सभी आलिमों को देख लीजिए और आप बताईये कि किसके 4 बीवियां हैं और किसके 25 बच्चे हैं ?
झूठे इल्ज़ाम लगाना सिर्फ़ नफ़रत फैलाना है और आज राष्ट्रवाद का अर्थ बस यही नफ़रत फैलाना भर रह गया है. इसका असर उल्टा हो रहा है. इस्लाम के बारे में जितना भ्रम फैलाया जा रहा है, लोग उसके बारे में जानने के लिए उतने ही ज़्यादा उत्सुक हो रहे हैं और जब वे सच जानते हैं तो उनकी सारी ग़लतफ़हमियां पल भर में काफ़ूर हो जाती हैं.

जिस समाज में एक से ज़्यादा विवाह को बुराई घोषित कर दिया जाता है  वहाँ विधवाओं की दुर्दशा होती है  . वृन्दावन में विधवाओं की दुर्दशा सबके सामने है .
एक ताज़ा घटना देखिए -
         यूपी के महोबा जिले के टपरन गाँव में एक महिला को पंचायत के फैसले के अनुपालन में ज़बरिया सफ़ेद साड़ी पहनने की शर्मनाक घटना सामने आई है. महिला का कसूर केवल इतना है कि विधवा हो जाने के बाद अपनी ससुराल से निकाले जाने के बाद अपने दो बच्चों को पालने के साथ उसने अपने भविष्य के लिए पुनर्विवाह कर लिया था. क्या विधवा को इतना भी हक़ नहीं है कि ससुराल से तिरस्कृत कर निकाले जाने के बाद वह अपनी औ अपने बच्चों की सुरक्षा और भविष्य के लिए फिर से विवाह कर सके ? भारतीय कानून इस बात की पूरी इजाज़त देता है क्योंकि कानून में इस तरह की रुढ़िवादी सामाजिक कुरीतियों के लिए कोई स्थान नहीं है फिर भी खुले आम पंचायतें इस तरह के फ़रमान जारी करती रहती हैं और उनके अनुपालन में गाँव वाले सामजिक मर्यादा को भी भूल जाते हैं. इस घटना में पुलिस के हरक़त में आ जाने के बाद मामला तूल पकड़ गया है वरना कोई भी इस घटना को जान भी नहीं पाता और इस महिला के साथ दुर्व्यवहार चलता ही रहता और गाँव में पंचायत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उसके साथ कोई भी खड़ा नहीं होता ? 
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शादीशुदा मर्द एक एक विधवा को भी सहारा दे दें तो विधवाओं को भी जीवन की खुशियाँ मिल सकती हैं।

Thursday, June 7, 2012

प्यारी माँ: आमिर की अम्मी की कहानी

Tuesday, June 5, 2012

विचार: ख़ानक़ाह - Manoj Kumar

चिश्ती ख़ानक़ाह

चिश्तियों के ख़ानक़ाह या दरगाह को जमात ख़ानक़ाह कहा जाता था। यह एक लम्बा हॉल होता है। इसकी छत कई खम्भों पर टिकी होती है। हरेक खम्भे के आधार-स्थल पर एक मुरीद (शिष्य) अपने सारे सामान के साथ रहते थे। एक वरिष्ठ सदस्य को पूरे ख़ानक़ाह की व्यवस्था की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। प्रत्येक ख़ानक़ाह में एक खुला हुआ किचन होता है, जिसे लंगर भी कह सकते हैं। एक चिश्ती ख़ानक़ाह में भोज्य पदार्थ पर्याप्त मात्रा में नहीं हुआ करते थे। जो भी वहां आते, जो कुछ भी होता, मिलकर बनाते, परोसते और मिल-बांट कर खाते। बाक़ी के समय में वे या तो प्रार्थना-ध्यान में समय व्यतीत करते या शेख़, जो वहां का प्रमुख होता, की सेवा करते। प्रार्थना और ध्यान के अलावे शेख़ को रोज़ सैंकड़ों आगन्तुकों से भी मिलना होता था। अपनी आध्यात्मिक या सांसारिक समस्याओं के समाधान के उद्देश्य से आगन्तुकों के रूप में दरवेश, रईसविद्वान, राजनीतिज्ञ, आदि आया करते थे। उन्हें यहां आकर आत्मिक शांति मिलती थी। कई बार तो ऐसा भी देखा गया कि चिश्ती संत राजाओं से लोगों की शिकायतों का निपटारा करने का निवेदन भी करते थे।

Saturday, June 2, 2012

प्रेमवाणी: मुर्दे को दफन करने आए थे लेकिन मुर्दे का धर्म अपना लिया




हमारे देश भारत की सब से बड़ी विशेषता यह है कि हम अनेकता में एकता का प्रदर्शन करते हैं। आज तक भारत के नागरिक परस्पर एक दूसरे से प्रेम, सद्व्यवहार, और सहानुभूति का मआमला करते हैं। एक दूसरे की खुशी और शोक में बराबर भाग लेते हैं। इस सम्बन्ध में अभी कुछ देर पहले डा0 सईद उमरी साहब का बयान सुन रहा था कि एक दिन उनके पास फोन आया कि हमारे क्षेत्र में एक मुस्लिम महिला की मृत्यु हो गई है और इस क्षेत्र में कोई मुस्लिम नहीं है आखिर इसका अन्तिम संस्कार कैसे किया जाए ?
डा0 साहब ने उन से निवेदन किया कि  यदि आप लोग हमारे पास लाश को पहुंचा सकते हैं तो हम आप के आभारी होंगे। कुछ ही देर में बीस आदमी लाश ले कर उपस्थित हो गए, आश्चर्य की बात यह है कि  सब गैर-मुस्लिम थे, जब क़ब्र खोदी जा रही थी तो डा0 साहब ने सारे गैर-...मुस्लिम भाईयों के समक्ष मरने के बाद क्या होगा ? के विषय पर प्रकाश डाला और बताया कि: किस प्रकार मुस्लिम और गैर-मुस्लिम की आत्मा निकाली जाती है और कैसे उसे परिवार से बिल्कुल दूर तंग कोठरी में डाल दिया जाता है या जला दिया जाता है।
फिर एक दिन उस से अपने सांसारिक कर्मों का लेखा जोखा लिया जाएगा जिस के आधार पर या तो स्वर्ग का सुखमय जीवन होगा या नरक का दुखद भरा जीवन। फिर उन लोगों से पूछा कि आप लोग इन दोनों में कौन सा जीवन पसंद करेंगे? तो सब ने कहा कि स्वर्ग का सुख भरा जीवन, अतः सब ने उसी स्थान पर इस्लाम स्वीकार कर लिया।

रूमी नाथ ने जाकिर हुसैन के साथ निकाह कर लिया Nikah


विधायक ने धर्म परिवर्तन कर प्रेमी से की शादी

असम की कांग्रेस विधायक रूमी नाथ के पति पिछले दस दिन से दावा कर रहे थे कि उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया है, लेकिन अब पता चला है कि वह अपने प्रेमी के साथ फरार हैं। यही नहीं, रूमी नाथ के फेसबुक अकाउंट पर दी गई ताजा जानकारी के मुताबिक उन्होंने धर्म परिवर्तन कर उस प्रेमी के साथ शादी भी रचा ली है।
रूमी नाथ ने फेसबुक पर जो जानकारी दी है, उसके मुताबिक अब उनका नाम राबिया सुल्ताना हो गया है। उन्होंने सामाजिक कल्याण विभाग के एक मुलाजिम जाकिर हुसैन के साथ निकाह कर लिया है। हुसैन से उनकी मुलाकात भी इसी सोशल साइट के जरिए हुई थी।
 कांग्रेस के टिकट पर चुने जाने से पहले वह एक बार भाजपा की विधायक भी रह चुकी हैं।

Friday, June 1, 2012

वाह रे टीम अन्ना

अभी तक अन्ना हजारे और किरण बेदी ने अनशन करके लोगो को समझाया पर जब पब्लिक नहीं समझ पा रही है, तो उनके लिये एक खुशखबरी आ गई है की अब टीम अन्ना में शामिल होने के लिये पूनम पाण्डेय को भी न्योता दे दीया गया है, जो अब न्यूड होके लोगो को युवाओं के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरुकता फैलाएंगी ,अभी तक तो आप लोगो को निराश होना पड़ा ,हो सकता है इस बार आपकी ये इच्छा पूरी हो जाये और आप पूनम पाण्डेय को न्यूड देख सके ,अब मै जादा कुछ नहीं कहूँगा आप खुद ही समझ लिजिये हो सकता है इस बार लोटरी लग ही जाये ,
                                                                                                                                     
                                                                                                                                     सौरभ दुबे

खबरगंगा: अप्रत्याशित नहीं है रणवीर सेना के संस्थापक की हत्या

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भोजपुर जिला मुख्यालय आरा में तडके सुबह रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद पूरे बिहार में तनाव की स्थिति बनी हुई है. हांलाकि नक्सली संगठनों और निजी सेनाओं के बीच कई दशकों के खूनी संघर्ष और जनसंहारों की फेहरिश्त की जानकारी रखने वालों के लिए यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है. उन्हें जमानत पर रिहा कराये जाने के साथ ही  उनकी हत्या की आशंका व्यक्त की जाने लगी थी. वास्तविकता यह है कि समय के अंतराल में रणवीर सेना का स्वरूप, उसकी प्राथमिकतायें पूरी तरह बदल चुकी हैं और अब मुखिया जी इसके लिए अप्रासंगिक हो चुके थे. उनके व्यक्तिगत समर्थकों की जरूर एक बड़ी संख्या है लेकिन संगठन को अब उनकी जरूरत नहीं रह गयी थी. 
अब रणवीर सेना और नक्सली संगठनों की लड़ाई में ठहराव सा आ गया है. नरसंहारों का सिलसिला थम सा गया है. ऐसे संकेत मिले हैं कि रणवीर सेना अपने आर्थिक स्रोतों की रक्षा और हथियारबंद लड़ाकों की उपयोगिता को बरकरार रखने के लिए हिन्दू आतंकवादी संगठन में परिणत हो चुकी है. यह बदलाव मुखिया जी के जेल में बंद होने के बाद का है. सेना का नेतृत्व करोड़ों की उगाही के जायज-नाजायज स्रोतों को किसी कीमत पर हाथ से नहीं निकलने दे सकता था. अब इस बात की आशंका थी कि मुखिया जी कहीं उसमें हिस्सा न मांग बैठें. संगठन के वर्तमान कार्यक्रमों में हस्तक्षेप न करें. 80 के करीब पहुंच चुके मुखिया जी सेना के अंदर और बाहर कई लोगों की आंख की किरकिरी बने हुए थे. हत्या की सीबीआई जांच की मांग हो रही है. जांच के बाद संभव है कि उनकी हत्या के रहस्यों का खुलासा हो जाये.

----देवेंद्र गौतम  

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