Monday, December 31, 2012

हिंदी ब्लॉगिंग के सामने संकट का एक सच्चा विश्लेषण Blogger's Analysis

हिंदी ब्लॉगिंग का एक साल और गुज़र गया लेकिन  फिर भी 10 साल पूरे नहीं हुए। इसके बावजूद हिंदी ब्लॉगिंग के 10 वर्षीय उत्सव मना डाले गए। हिंदी ब्लॉगिंग की इस प्री-मेच्योर डिलीवरी या भ्रूण हत्या को पूरे ब्लॉग जगत ने देखा और सराहा। संवेदनशील काव्यकारों और बुद्धिकारों ने इसमें सक्रिय सहयोग दिया और बदले में सम्मान आदि पाया। इसमें जो ख़र्च आया, उसे भी सहर्ष स्वीकार किया गया और यह परंपरा आगे भी जारी रहे, इसके लिए वे प्रयासरत हैं। इस तरह नाम और शोहरत के ग्राहकों और सप्लायरों ने हिंदी ब्लॉगिंग का व्यापारीकरण कर दिया। यह एक दुखद घटना है और इससे भी ज़्यादा दुखद यह है कि सब कुछ जानते हुए भी लोग बाग डरे हुए हैं और टुकुर टुकुर चुपचाप देख रहे हैं। किसी को आगे सम्मान की इच्छा है और किसी को यह इच्छा है कि उसकी पोस्ट पर टिप्पणियां देने वाले बने रहें। इन्हीं में वे लोग हैं जो सम्मान की ख़रीद फ़रोख्त करते हैं।
हिंदी ब्लॉगिंग को नुक्सान पहुंचाने वाली दूसरी वजह गुटबाज़ी और सांप्रदायिक मानसिकता है। किसी विशेष विचारधारा वाले ब्लॉगर का हौसला पस्त करने के लिए हरसंभव तरीक़े इस्तेमाल किए गए और नतीजा कई प्रतिभाशाली ब्लॉगर के पलायन के रूप में सामने आया।
इन दो मूल कारणों से कई विकार सामने आए। मस्लन मठाधीश बनने की कोशिश की गई और इस चक्कर में मठाधीश ही आपस में टकरा कर अपना सिर फोड़ते रहे। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और कवि आदि सभी ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
इस चक्कर में वे ब्लॉगर पिस कर रह गए जो कि अच्छा लिखने आए थे और उन्होंने लिखा भी, लेकिन न तो वे किसी को गॉड फ़ादर बना पाए और न ही कमेंट बटोरने की कला में माहिर हो सके। इनसे बेनियाज़ (निरपेक्ष) भी वह न हो पाए क्योंकि अपनी कला का प्रदर्शन और सराहना एक साहित्यकार का पहला मक़सद होता है।
इसीलिए बहुत से हिंदी ब्लॉगर मैदान छोड़कर भाग गए। कोई चुपचाप निकल गया और ऐलान करके बता कर गया। जो भाग नहीं सकते या भाग नहीं पाए, वे अब भी जमे हुए हैं लेकिन लिखना उन्होंने भी पहले से कम कर दिया है।
कुछ नए ब्लॉगर भी मैदान में आए हैं, आते रहेंगे और जाते भी रहेंगे क्योंकि हिंदी ब्लॉगिंग से मोह भंग करने के कारण बदस्तूर मौजूद हैं और दूसरों के साथ हम इन घटनाओं के साक्षी हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि वे डरे हुए हैं और चुप हैं जबकि हम बेख़ौफ़ और बेबाक़ हैं।
हम बचाते ही रहे दीमक से अपना घर
चंद कीड़े कुर्सियों के मुल्क सारा खा गए

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो,
आमीन !!!


नया साल 2013 ब्लॉगर्स और ग़ैर-ब्लॉगर्स सबको मुबारक हो !

Saturday, December 29, 2012

‘मुझको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन'- ग़ालिब को खिराजे अक़ीदत

'बुनियाद' ब्लॉग पर

ग़ालिब को खिराजे अक़ीदत पेश करते हुए -
‘मुझको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन 
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब यह ख़याल अच्छा है‘
नास्तिक लोग इस शेर को आख़िरत (परलोक) और जन्नत (स्वर्ग) के इनकार के लिए पेश करते हैं लेकिन जानना चाहिए कि इस शेर से मिर्ज़ा ग़ालिब कि मंशा जन्नत का इंकार करना नहीं था बल्कि बिना नेक अमल किये जन्नत पाने के ख़याल को गलत ठहराना था . इसीलिए मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा है कि
कोई उम्मीद बर नहीं आती/कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मु'अय्यन है/नींद क्यों रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी/अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़ुहुद/पर तबीयत इधर नहीं आती 

27 दिसम्बर को मिर्ज़ा ग़ालिब की जयंती थी. मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग उर्फ “ग़ालिब” का जन्म 27 दिसम्बर 1776 को आगरा के एक परिवार में हुआ था। जिसकी पृष्ठभूमि सैनिक और राजनीतिक थी. वे उर्दू और फ़ारसी के महान शायर थे। आगरा, दिल्ली और कलकत्ता में अपनी ज़िन्दगी गुजारने वाले ग़ालिब को मुख्यतः उनकी ग़ज़लों को लिए याद किया जाता है। उन्हें उर्दू के ऐसे महान शायरों में गिना जाता है। जिनकी शोहरत समय के साथ बढती गयी. ग़ालिब (और असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। 1850 मे शहंशाह बहादुर शाह ज़फर द्वितीय ने मिर्ज़ा गालिब को "दबीर-उल-मुल्क" और "नज़्म-उद-दौला" के खिताब से नवाज़ा। बाद मे उन्हे "मिर्ज़ा नोशा" का खिताब भी मिला।
उन्होने अपने बारे में स्वयं लिखा था, 
हैं और भी दुनिया में सुखन्वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और

Friday, December 28, 2012

ब्लॉगिंग से मोह भंग की मूल वजह बताने में हिचकिचाहट कैसी ?


ब्लॉगिंग से मोह भंग की मूल वजह जो है उसे कहना समझदारी के खिलाफ़ समझ लेने से भी हिन्दी ब्लॉगिंग पर बुरा असर पड़ा है.
See:
डा. टी. एस. दराल साहब अपनी लम्बी पोस्ट में यह मूल वजह कितनी स्पष्ट कर पाए हैं ?
यह देखना आपका काम है .
अंतर्मंथन: 2012 -- ब्लॉगिंग की राह में मज़बूर हो गए --- हिंदी ब्लॉगिंग का कच्चा (चर्चा) चिट्ठा !

अब आप एक छोटी सी पोस्ट भी देखिये,  ब्लॉगिंग छोड़ने से पहले उन्होंने क्या कहा है ?


कमेन्ट माफिया 


आज कल हमारे ब्लॉग जगत पर एक अलग सा माफिया ग्रुप का कब्ज़ा हो गया। इस माफिया ग्रुप का नाम मैंने रखा हैं कमेन्ट माफिया या सी कंपनी भी कह सकते हैं।

कुछ लोगो का आपसी ग्रुप इतना मजबूत हो चूका हैं कि अगर किसी ब्लोगेर ने दादी कि सुनी हुई कहानी भी लिख दी तो ७०- ८० कमेन्ट तो मिल ही जाता हैं। और कुछ ब्लोगेर बंधू तो ऐसे हैं कि सिर्फ महिलावो के ब्लॉग पर ही टिप्पड़ी करेंगे। और कुछ कि तो बात ही अलग हैं।

कुछ बंधू तो nice लिख कर के चलते बनते हैं।

भाई लोग ऐसा क्यों करते हैं। मैंने बहुत से ऐसे ब्लॉग देखे हैं जिनमे बहुत सी अच्छी -अच्छी जानकारी दी गई, होती हैं, धर्म के उपर बहुत से ब्लॉग अच्छी जानकारी देते हैं। समाज के उपर हो या विज्ञानं के उपर लेकिन ऐसे लेख बिना पढ़े ही रह जाते हैं। आज कि राजनितिक हलचल हो या महंगाई , कोई नहीं जाता , बेचारा लिखने वाला भी सोचता हैं कि में क्या लिखू।

में अपनी बात ही कह दू, कि अगर मैं किसी कि बुराई करता नज़र आ जाऊ तो लोग दबा के टिप्पड़ी करेंगे लेकिन अगर कोई अच्छी बात लिखने लगु तो ऐसे लगता हैं कि साली टिप्पड़ी भी नासिक के प्याज के खेते से आ रही हैं।

खैर अब देखता हूँ।

Wednesday, December 26, 2012

‘आओ क़ुरआन और नमाज़ समझें‘ शिविर का आयोजन सकुषल संपन्न


‘अल्लाह ने क़ुरआन उतारे जाने का मक़सद उसमें ग़ौर व फ़िक्र करना और उससे नसीहत हासिल करना बताया है ताकि इंसान अपने दुष्मन षैतान के बहकावे में आकर बुरे काम करने से बच सके। इसीलिए क़ुरआन में कहा गया है कि हमने क़ुरआन को नसीहत हासिल करने के लिए और याद करने के लिए आसान कर दिया है, क़ुरआन की अरबी बहुत आसान है। इसे बहुत कम मेहनत से सीखा जा सकता है। जिससे नमाज़ में रोज़ाना बार बार पढ़ा जाने वाला क़ुरआन समझ में आने लगता है और इससे फ़ायदा यह होता है कि समझ में आने के बाद नमाज़ और क़ुरआन में भी दिल लगता है और एक नमाज़ी एक बेहतरीन इंसान बन जाता है। बार बार अल्लाह के हुक्म को सुनने के बाद उसके लिए ज़ुल्म ज़्यादती करना, किसी का हक़ मारना और गुनाह करना मुमकिन नहीं रहता।‘उक्त विचार जनाब अब्दुर्रहीम नईमुददीन साहब ने व्यक्त किए। वह ‘अंडरस्टैंड क़ुरआन एकेडमी, हैदराबाद‘ की ओर से मुस्लिम डिग्री कॉलिज मुरादाबाद में ‘आओ क़ुरआन और नमाज़ समझें‘ षीर्शक के अंतर्गत एक 4 दिवसीय प्रषिक्षण शिविर में 190 लोगों के सामने बोल रहे थे। दिनांक 23 दिसंबर 2012 से दि. 26 दिसंबर तक चलने वाले इस षिविर का आयोजन डा. नदीम हाषमी की ओर से किया गया। इस शिविर में ख़ालिद एडवोकेट, गुफ़रान अहमद सिददीक़ी, ज़ाहिद साहब, जव्वाद अहमद, साजिद अहमद, इक़बाल ज़फ़र, ख़ालिद भाई, बरकतुल्लाह, डा. एम रहमान, मुमताज़ आदि ने अपना सक्रिय सहयोग दिया। कॉलिज के प्रिंसिपल जमील अहमद ख़ां व सीनियर असिस्टेंट मैनेजर अनवर आलम लतीफ़ी के उत्तम प्रबंध को सराहते हुए षिविर में भाग लेने वालों ने जल्दी ही इस प्रोग्राम को फिर से करवाने की तमन्ना ज़ाहिर की। इस अवसर पर तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन के लिए विष्व विख्यात विद्वान सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ व रूहानी षैख़ सैयद हफ़ीज़ अहमद नक्षबंदी भी मौजूद थे। जनाब अब्दुर्रहीम नईमुददीन साहब ने नगर के बुद्धिजीवियों व विभिन्न स्कूलों के प्रधानाचार्यों  के सामने एक अलग सत्र में अपने इस कोर्स की विषेशताओं पर एक विस्तृत लेक्चर देकर स्कूल पाठयक्रम में इसे पढ़ाए जाने की आवष्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि 3 खंडों में सिखाया जाने वाला यह कोर्स मदरसों के परंपरागत पाठ्यक्रम से अलग है और आधुनिक वैज्ञानिक षोध पर आधारित है। यह कोर्स विष्व की 18 भाशाओं में  उपलब्ध है और दुनिया के बहुत से देशों  में इसे स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है। 


http://www.facebook.com/notes/anwer-jamal-khan/%E0%A4%86%E0%A4%93-%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%86%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BC-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%9D%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8/235720926561560?comment_id=991766&notif_t=note_comment

Tuesday, December 25, 2012

दिल्ली गैंगरेप- आंदोलन नहीं पागलपन, समाज की ज़िम्मेदारी क्या और कितनी ?

अरुणेश दवे लिखते हैं -
"हमारे नेता नपुंसक है", "हमारी पुलिस नपुंसक है" "बलात्कारी को फ़ांसी दो" का नारा लगाने वालो से मै पूछना चाहता हूं कि कहा से आये है ये लोग? इन बलात्कारियों को इसी समाज ने पैदा किया है और नेताओ को भी। और मनोविकार पैदा कौन कर रहा है? जापानी तेल और लिंग वर्धक यंत्र का विज्ञापन कौन छापता है नेता या मीडिया? पुरूष जीन्स के विज्ञापन में अर्धनग्न महिला का फ़ोटो कौन दिखाता है नेता या मीडिया ? महिलाओ के जिस्म की नुमाइश कर अपना माल बेचने वाले बाजार को माध्यम कौन दे रहा है नेता कि मीडिया ??? अपने उकसाये आंदोलन के इस हिंसा के दौर में पहुंचने पर लोगो से शांती और अहिंसा की अपील कर रहे मीडिया ने पत्रकारिता नैतिकता और ढोंग की सारी हदें पार कर दी हैं। खाप पंचायत वाले अपनी बेटियों को जब इस बाजारवाद के दुष्परिणामो से बचाने की कोशिश करते तो यही मीडिया उनको तालीबान करार देता है। फ़ांसी की सजा ही एक समाधान हो सकता है पर इस देश में कानून का कितना दुरूपयोग होता है यह भी किसी से छुपा नही है।

दिल्ली गैंगरेप- आंदोलन नहीं पागलपन

लिंक - http://aruneshdave.blogspot.in/2012/12/blog-post_23.html?showComment=1356444405301#c2566775432981347120

Wednesday, December 19, 2012

दीन के नाम पर दुकानदारी The Great Sin


दीन के नाम पर दुकानदारी करने वाले मुल्लाओं की एक कारस्तानी The Sin

इसलाम एक चेतना है, क़ुरआन व सीरत पढ़कर इसे अपने अंदर ख़ुद जगाना पड़ता है। यह चेतना न जागे तो इसलाम महज़ कुछ निर्जीव परम्पराओं का समूह बन कर रह जाता है और जाहिल लोग इसलाम का नाम लेकर अपनी चौधराहट क़ायम कर लेते हैं। लोग इन्हें अपना नेता, पीर और क़ाज़ी समझते हैं। ये लोग उन ग़रीबों से भी धन ऐंठ लेते हैं, जिन्हें कि ज़कात व सदक़ा दिया जाना चाहिए। आम मुसलमान को क़ुरआन, मदरसे और मस्जिद से अक़ीदत (श्रद्धा) होती है। ये मुफ़्तख़ोर चौधरी मुसलमानों की अक़ीदत का फ़ायदा उठाते हैं। इसलाम और मुसलमानों को दुनिया में बदनाम करने वाले यही हैं। 
सोहराब अली द्वारा लिखित मुईनुददीन और मरियम का वाक़या ऐसे ही ज़रपरस्तों को बेनक़ाब करता है.

इस्लाम को कलंकित करने वाला फरमान

ऐसा लगता है कि आजकल इस्लाम को बदनाम करने का ठेका स़िर्फ मुसलमानों ने ले रखा है. न स़िर्फ दुनिया के तमाम देशोंबल्कि भारत से भी अक्सर ऐसे समाचार मिलते रहते हैंजिनसे इस्लाम बदनाम होता है और मुसलमानों का सिर नीचा होता है.

Tuesday, December 18, 2012

उर्दू जानने वालों के लिए एक भेंट Book Set Christianity & Tauheed

उर्दू जानने वालों के लिए एक भेंट

Iqbal Seth added a photo from December 18, 2012 to his timeline.
christmas पर जिधर यह शांता कलाज देखें पूछें where are you in the Bible? और फिर हमें बताएं

مطالعہ مسیحیت ہے اس موضوع سے متعلقہ تمام اسلامی مکاتب فکر کی تحریرات آپ کو یہاں مل سکیں گی ۔
http://only1or3.com/books.html
christmas पर जिधर यह शांता कलाज देखें पूछें where are you in the Bible? और फिर हमें बताएं

مطالعہ مسیحیت ہے اس موضوع سے متعلقہ تمام اسلامی مکاتب فکر کی تحریرات آپ کو یہاں مل سکیں گی ۔
http://only1or3.com/books.html

Merry christmas you are agreeing that jesus christ was born on the 25th of December and your are agreeint htat he is the begotten sonof God....
 shirk (Picture)
http://www.facebook.com/photo.php?fbid=243285085745074&set=a.243284192411830.57419.176316369108613&type=1&relevant_count=1

can God ever take Birth? Picture
http://www.facebook.com/photo.php?fbid=243284195745163&set=a.243284192411830.57419.176316369108613&type=1&relevant_count=1

where are you in the bible?  Picture 
www.facebook.com/photo.php?fbid=243284589078457&set=a.243284192411830.57419.176316369108613&type=1&relevant_count=1

Monday, December 10, 2012

किसी मुसलमान द्वारा फतवा हासिल किया जाता है और उसका समाचार पत्रों और टीवी पर जिस तरह से शोर शराबा किया जाता है उसका कोई मतलब नहीं होता है-आशुतोष शुक्ल Fatwa in Islam

पूरा लेख यहाँ पढ़ें -

फतवा ज़रूरी या स्वैच्छिक ?


किसी मसले पर जहाँ पर किसी मुसलमान की समझ में कुछ नहीं आता है कि कहीं उसके द्वारा किया जाने वाला कोई काम इस्लामिक मूल्यों पर ग़लत न हो तो वह मुफ्ती और उलेमा की राय मांगने के लिए स्वतंत्र है पर साथ ही यह भी देखना चाहिए कि उस व्यक्ति की परिस्थितियां क्या थीं और किस तरह से उसने काम किया है ? हर स्थान पर परिस्थितयां भिन्न हो सकती है और किसी एक फतवे को सभी पर बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता है तभी इस्लाम में फतवे को बाध्यकारी बनाने की जगह स्वैच्छिक बनाया गया है. यह इस्लाम की राह पर चलने का सही रास्ता तो बताता ही है साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि इस्लाम के अनुयायी किस तरह से अपने जीवन को सही ढंग से जी पाएं. आज जिस तरह से पत्रकारिता की जाती है उसमें भी किसी भी फतवे को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है जबकि उसके पूरे सन्दर्भ का ज़िक्र भी नहीं किया जाता है. किसी भी फतवे को लेकर जब भी कुछ छपता है तो लोग उसके असली पहलू को समझने के स्थान पर अपने ढंग से उसकी भी व्याख्या करना शुरू कर देते हैं. अब सही समय है कि इस्लामिक शिक्षा केन्द्रों को केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि इस्लाम के मूल्यों की सही जानकारी सभी तक पहुँचाने के लिए सही दिशा में प्रयास करने चाहिए जिससे इस तरह के किसी फतवे को लेकर अनावश्यक रूप से सनसनी फ़ैलाने का काम न किया जा सके.  

Friday, December 7, 2012

हिन्दुत्व के 20 हजार करोड़ रुपये


हिन्दुत्व के 20 हजार करोड़ रुपये



रणधीर सिंह सुमन
हिन्दुत्ववादी संगठन व उसकी सोच वाले लोग हर समय कांग्रेसी भ्रष्टाचार को कोसते रहते हैं लेकिन उनकी निगाहें अपनी तरफ कभी नहीं होती हैं। 

Thursday, December 6, 2012

अवाम को लूटने वाले उलमा और पीरों की हक़ीक़त

दीन को मज़हब और मज़हब को पेशा बनाकर अवाम को गुमराह करने वाले, उसे लूटने वाले उलमा और पीरों की हक़ीक़त-एक रिपोर्ट
DR. ANWER JAMAL at इसलाम धर्म - 19 hours ago
Allama S. Abdullah tariq sahab Masjid me Namaze Juma ada karane ke baadअल्लामा सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब रियासत रामपुर में रहते हैं और दीन का काम करते हैं। इसलाम को उन्होंने ‘डिस्कवर‘ किया है। इसलाम को डिस्कवर करने का मतलब यह है कि उन्होंने बरसों बरस इसलाम को समझने में लगाए हैं और जब वह समझ गए तो फिर उन्होंने अपनी ज़िंदगी दीन को समझाने के लिए ही वक्फ़... More »
और इसी पोस्ट को 'बुनियाद' पर भी देखें-
अवाम को लूटने वाले उलमा और पीरों की हक़ीक़त
दीन को मज़हब और मज़हब को पेशा बनाकर अवाम को गुमराह करने वाले, उसे लूटने वाले उलमा और पीरों की हक़ीक़त-एक रिपोर्ट  Allama S. Abdullah tariq sahab Masjid me Namaze Juma ada karane ke baad, 
आगे पढ़ें...

Monday, December 3, 2012

भारतीय गाय के प्रति 'उसके अपनों' का व्यवहार 'Goraksha & Gohatya'

गाय के प्रति अपनी चिंता जताते हुए

मुझे याद है कि जब मैं छोटा था और कुछ वर्ष गाँव में ही रहते हुए यह देखता था कि गाय जब बूढ़ी हो जाती थी और दूध देना बंद कर देती थी तो हिन्दू,जो गाय को माता की संज्ञा देते हैं, ही उसे कसाई को बेच अपना पिंड छुड़ा कर आ जाते थे और ऐसा गाँवों में आजकल भी निरंतर हो रहा है...
आपने एक सार्थक पोस्ट लिखी इसके लिए शुभकामनाएं...

देखें पूरी पोस्ट निम्न लिंक पर -


गायें खा रही हैं "गौमांस" और इंसान.....


Saturday, December 1, 2012

इस्लाम की नज़र में ग़ैर मुस्लिमों के अधिकार Jaziya


लेखक: नकीबुल हक

हिन्दू भाई, इस्लाम की नज़र में


टर्निंग पॉइंट 
मुआहिदा हलफ़ अलफ़ज़ोल में बनू हाशिम, बनू मुत्तलिब, बनू ज़ोहरा और बनू तमीम शामिल थे,  इसके मेम्बरान ने भी इस बात का इक़रार किया कि हम मुल्क से बदअमनी दूर करेंगे। मुसाफ़िरों की हिफ़ाज़त करेंगे, ग़रीबों की इमदाद करते रहेंगे, ज़बरदस्त को ज़ेर दस्त पर ज़ुल्म करने से रोका करेंगे। रियासत मदीना में जो दफ़आत मुरत्तिब हुईं उनका ख़ुलासा ये है:
(1)          तमाम मुसलमान एक दूसरे को रज़ाकार समझेंगे।
(2)          मदीना में रहते हुए ग़ैर मुस्लिमीन को मज़हबी आज़ादी हासिल होगी ।
(3)          मदीना का दिफ़ा जिस तरह मुसलमान अपना हक़ समझते हैं इसी तरह ग़ैर मुस्लिमीन पर भी ये ज़िम्मेदारी आइद हुई है ।
(4)          ख़ारिजी हमले के वक़्त तमाम अफ़राद मदीना का दिफ़ा करेंगे।
(5)          हर क़ातिल मुस्तहिक़े सज़ा होगा।
(6)          तमद्दुन और सक़ाफ़ती मुआमलात में ग़ैर मुस्लिमीन को मसावी हुक़ूक़ दिए जाऐंगे।
(7)          ग़ैर मुस्लिमीन और मुसलमान एक दूसरे एक के हलीफ़ हैं, वक़्त ज़रूरत एक दूसरे की मदद करेंगे।
(8)          अगर दोनों क़ौमों पर कोई हमला करता है तो एक दूसरे का साथ देंगे।
(9)          ग़ैर मुस्लिमीन और मुसलमानों में इख़्तेलाफ़ की नौबत आ जाती है तो मुआमला दरबारे रिसालत सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम में पेश किया जाएगा और मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का आख़िरी और क़तई फ़ैसला मंज़ूर होगा।
(10)        ग़ैर मुस्लिमीन के ज़ाती मुआमलात में दख़ल अंदाज़ी नहीं की जाएगी।
(11)        तमाम तब्क़ात को मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सियादत व क़यादत तस्लीम नहीं की जाएगी। इन हुक़ूक़ से अंदाज़ा होता है कि यक़ीनन रियासत मदीना मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सियासी बसीरत की आला तरीन मिसाल है, क्योंकि सहराए अरब के उम्मी नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उस वक़्त दुनिया को सबसे पहले जामे तहरीरी दस्तूर से मुतआर्रिफ़ कराया जब अभी दुनिया की सियासत आईन या दस्तूर से नाआशना थी। मग़रिबी दुनिया का आईन दस्तूरी सफ़र 1212 ईस्वी में शुरू हुआ जब शाह इंग्लिस्तान (King Jahn) ने मह्ज़र कबीर (Magnacarta) पर दस्तख़त किए जबकि इससे 593 साल क़ब्ल जामे तरीन तहरीरी दस्तूर दुनिया को दिया जा चुका है। इसके बाद 16 दिसंबर 1686 में Bill of Right 1700-1 में the act of settlement और 1911 में The Parliament Act  को इख़्तियार किया गया और अमेरिका का Convention Constitution 1787 में और फ़्रांस में क़ौमी असेम्बली ने आईन को मंज़ूरी 1791 में दी। मग़रिब का ये दस्तूर  सफ़र 1215 में शुरू हो चुका था, मगर आम आदमी तक इसके असरात पहुंचने में सदियां गुज़र गईं जबकि एक 1 हिजरी रियासत मदीना से शुरू होने वाला इस्लाम का सियासी व आईनी सफ़र 10 साल के कम अर्से में अपने मुंतहाए कमाल को पहुंच गया।
आज हम देखते हैं कि तरक़्क़ी याफ़्ता ममालिक के दसातीर में अमेरीका के दस्तूर को 7000 अल्फ़ाज़ का मुख़्तसर तरीन मिसाली दस्तूर क़रार दिया जाता है, मगर सवा चौदह सौ साल क़ब्ल मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का दिया हुआ 730 अल्फ़ाज़ पर मुश्तमिल मीसाक़े मदीना इससे कहीं ज़्यादा जामे, मोअस्सर और मोकम्मल दस्तूर है जिसमें तमाम तब्क़ात के हुक़ूक़ का तहफ़्फ़ुज़ किया गया है मुख़्तलिफ़ रियासती वज़ाइफ़ की अदायगी का तरीकएकार तय कर दिया गया है।
रियासत मदीना के ज़िम्न में ये बात अर्ज़ की जा सकती है कि इन ममालिक में जहां मुसलमानों के अलावा दूसरी कौमें रहती और बसती हैं और एक मज़हब के बजाय कई मज़ाहिब और एक क़ौमियत के बजाय कई क़ौमों के लोग एक साथ रहते हैं तो ऐसे ममालिक में अक़ल्लियतों ख़ुसूसन मुस्लिम अक़ल्लियत अपने हुक़ूक़ की बाज़याबी के लिए रियासत मदीना को उस्वए कामला समझे, क्योंकि अग़यार व एदा के दरमियान में रह कर जिन मुश्किलात व मसाइब का आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने मुक़ाबला किया और जिस तरह सब्र व इस्तेक़ामत और हिक्मत व मस्लेहत के साथ इस्लाम का पैग़ाम पहुंचाया इससे बढ़ कर और कोई क़ाबिले तक़्लीद अमल नहीं हो सकता। रसूले करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की दावती ज़िंदगी में एक मर्हला जो तक़रीबन नज़रअंदाज किया जाता है, वो रियासत मदीना का जो आलमे इंसानियत की अज़मत रफ़्ता की बाज़याबी का अहम सबब है।
नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी मसाईए जमीला, हिक्मत व मस्लेहत के ज़रिए किस तरह एदाए इस्लाम को सुरंगों कर लिया और फ़ुतूहात का दरवाज़ा वसी से वसीतर होता चला गया। बड़े दर्द और कर्ब के साथ ये कहना पड़ रहा है कि आज हिंदुस्तान में अक़ल्लियतों बिलख़सूस मुस्लिम अक़ल्लियत के अंदर मुआमलाफह्मी,  दूर अंदेशी,  दानिश व बीनिश, हिक्मत व मस्लेहत और सियासी बसीरत का फ़ुक़दान है जिसकी बिना पर मुस्लिम अक़ल्लियत का अभी तक कोई मुतालिबा पूरा नहीं किया गया। हुकूमतें आती जाती रहीं मगर आज तक उनकी बुनियादी मसाइल पर अमल दर आमद किसी ने नहीं किया। हाँ अक़ल्लियतों के हुक़ूक़ की बाज़याबी के लिए एसोसिएशन, कमीशन, कमेटियां तश्कील तो की गईं मगर उनको अमलीजामा नहीं पहनाया गया।
हसरत होती है अर्बाबे इक़्तेदार की दग़ाबाज़ियों, चालबाज़ियों, मक्कारियों, अय्यारियों और मक्र व फरेब पर कि वो हमें सब्ज़बाग़ दिखा कर आज तक हमारे हुक़ूक़ का इस्तेहसाल करते रहे। इसलिए मर्कज़ी और रियास्ती हुकूमतों के लिए रियासत मदीना ताज़ियानए इबरत है कि सेकूलर मुल्क में किस तरह अक़ल्लियत और अक्सरीयत के हुक़ूक़ व फ़राइज़ का एहतेमाम किया जाता है। साथ साथ ये भी अर्ज़ कर दूँ कि आज हमारे इदारों, मदारिस,  ख़ानक़ाहों और जामिआत में अफ़राद साज़ी, किरदार साज़ी और तर्बियत पर कम तवज्जो दी जा रही है जबकि आज आलमे इंसानियत को मुहज़्ज़ब, शाइस्ता, संजीदा, लायक़, दूरबीं, दूर रस और तर्बियत याफ़्ता अफ़राद की ज़रूरत है कि जो उम्मत के मर्ज़ की सही तशख़ीस कर सकें। रियासत मदीना से हमें ये सबक़ मिलता है कि हम जज़्बात से कम हिक्मत व मसलहेत से ज़्यादा काम लें। ये आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की आला तरीन सियासी बसीरत का शाहकार है कि चंद बरसों में एदाए इस्लाम की साज़िशें, मंसूबे, कोशिशें और औहाम व ख़्यालात ख़ाकसतर हो गए और उन्हें ख़ुद मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की क़यादत और मुसलमानों का एक वजूद तस्लीम करना पड़ा। अगर हम मौजूदा दौर में इन दरख़शां आईन व क़वानीन को नजरअंदाज़ करके अपने हुक़ूक़ की बक़ा व तहफ़्फ़ुज़ की जंग लड़ते रहे तो हमारी पसपाई, नामुरादी मायूसी यक़ीनी है, क्योंकि इस्लाम ने इबादत से ज़्यादा ज़ोर सियासत, मुआमलात, अख़लाक़ियात, संजीदगी, फ़हम व शाऊर और सियासी सूझ बूझ पर दिया है और बातिल परस्तों को महवे हैरत और शुशदर बना दिया और ये साबित कर दिया कि तंग व तारीक दौर में बक़ा सिर्फ़ मिल्लते इस्लामिया की हो सकती है। अगर नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ये मुनज़्ज़म लाइहे अमल तैय्यार ना करते तो जज़ीरतुल अरब तक ही ये उसूल व ज़वाबित महदूद रहते लेकिन नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सारे उसूल पूरे आलम के लिए लाइहे अमल और मशअले राह हैं। आज के वो मुमालिक जहां हुकूमतें अक्सरीयत दूसरे मज़ाहिब के हामिलीन की है और मुसलमान वहां अक़ल्लियत की हैसियत से जी रहे हैं तो वो रियासत मदीना और सीरत तैय्यबा के तनाज़ुर में रहनुमाई हासिल करें और पुर अमन ज़िंदगी गुज़ारने का मक़सद तैय्यार करके, मुल्क के आईन और अदालत से हक़ हासिल कर सकते हैं और अपने हुक़ूक़ व फ़राइज़ को यक़ीनी बना सकते हैं ।

‘ब्लॉग की ख़बरें‘

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8- बेवफा छोड़ के जाता है चला जा
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19- दुनिया में सबसे ज्यादा शादियाँ करने वाला कौन है?
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