Monday, January 7, 2013

बलात्कार का इतिहास इण्डिया से भारत तक Balatkar


आजकल आर.एस.एस.प्रमुख के बयान की हर तरफ़ आलोचना हो रही है. उन्होंने कह दिया कि -
रेप की घटनाएं भारत में कम इंडिया में ज्यादा होती हैं, क्योंकि वहां विदेशी सभ्यता का असर ज्यादा दिखाई देता है, आप देश के गांवों और जंगलों में देखें जहां कोई सामूहिक बलात्कार या यौन अपराध की घटनाएं नहीं होतीं. यह शहरी इलाकों में होते हैं. महिलाओं के प्रति व्यवहार भारतीय परंपरागत मूल्यों के आधार पर होना चाहिए. - आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
इस तरह वह यह दिखाना चाहते हैं कि बलात्कार पश्चिमी सभ्यता की देन है. अगर लोग भारतीय संस्कृति को अपना लें तो इस तरह की घटनाएं बंद हो जायेंगी. इस तरह की बात इतिहास और सच्चाई दोनों के विरूद्ध है.
इससे पहले नभाटा के 'अपना ब्लॉग' पर एक भाई ने घोषणा की थी कि 'बलात्कार की मानसिकता मुगलों की देन है'.
1- जब भारत इण्डिया नहीं बना था , क्या तब यहाँ अहिल्या को छोड़ दिया जाता था ?
2- अगर प्राचीन भारत में बलात्कार नहीं होते थे तो मनु स्मृति में बलात्कार को विवाह के 8 प्रकार में से एक क्यों माना गया है ?
3- जब भारत सचमुच भारत था तब औरत का हाल यह था कि सत्यकाम ने अपनी माँ जाबाला से अपने पिता का नाम पूछा तो वह वह बता नहीं पाई.
हिन्दी ब्लॉगर पंडित अनुराग शर्मा जी के अनुसार -
"उपनिषदों में जाबालि ऋषि सत्यकाम की कथा है जो जाबाला के पुत्र हैं। जब सत्यकाम के गुरु गौतम ने नये शिष्य बनाने से पहले साक्षात्कार में उनके पिता का गोत्र पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि उनकी माँ जाबाला कहती हैं कि उन्होंने बहुत से ऋषियों की सेवा की है, उन्हें ठीक से पता नहीं कि सत्यकाम किसके पुत्र हैं ?"
इस कथा से सच्चे प्राचीन भारत में स्त्री की गरिमा का पूरा पता चल जाता है.
क्रिमिनिल लॉ जर्नल में प्रकाशित आंकड़ों पर नजर डालें तो हाई कोर्ट में 80 फीसदी और सुप्रीम कोर्ट में 75 फीसदी रेप केस ग्रामीण इलाकों से दर्ज थे. वहीं गैंग रेप के जो मामले हाईकोर्ट (75%) और सुप्रीम कोर्ट (68%) में दर्ज हैं उनमें से अधिकांश मोहन भागवत के ‘भारत’ में से ही हैं. बस मीडिया और लाइमलाइट में ना आने के कारण यह मामले दबा दिए जाते हैं.

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शालिनी कौशिक 


! कौशल !: @मोहन भागवत जी-अब और बंटवारा नहीं .

8 comments:

शालिनी कौशिक said...

बहुत सही बात कही है आपने @मोहन भागवत जी-अब और बंटवारा नहीं

डा. श्याम गुप्त said...

-- अरे मूर्ख लोगो ..जरा कथाएँ ठीक ढंग से तो पढो और अर्थ समझो....सही कथा यह है ...


"सत्यकाम जाबाल, महर्षि गौतम के शिष्य थे जिनकी माता जबाला थीं और जिनकी कथा छांदोग्य उपनिषद् में दी गई है। सत्यकाम जब गुरु के पास गए तो नियमानुसार गौतम ने उनसे उनका गोत्र पूछा। सत्यकाम ने स्पष्ट कह दिया कि मुझे अपने गोत्र का पता नहीं, मेरी माता का नाम जबाला और मेरा नाम सत्यकाम है। मेरे पिता युवावस्था में ही मर गए और घर में नित्य अतिथियों के आधिक्य से माता को बहुत काम करना पड़ता था जिससे उन्हें इतना भी समय नहीं मिलता था कि वे पिता जी से उनका गोत्र पूछ सकतीं। गौतम ने शिष्य की इस सीधी सच्ची बात पर विश्वास करके सत्यकाम को ब्राह्मणपुत्र मान लिया और उसे शीघ्र ही पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो गई।"
---इसी प्रकार सभी कथाएं हैं----आप जैसे लोगों की यह औकात नहीं है कि इन कथाओं के तत्व को जन सकें .....
----और सत्य तो यह है कि ऐसे ही लोगों व विचारों के कारण रेप बढ़ रहे हैं इंडिया में..
---इंडिया - भारत का अर्थ शहर व गावं नहीं अपितु ..पाश्चात्यीकरण के पथ पर चलने वाला समाज व स्व-संस्कृति पर चलने वाला अमाज है....

रविकर said...

hmm

DR. ANWER JAMAL said...

@ डा. श्याम गुप्त जी ! अगर आप पोस्ट भी ढंग से न पढ़ सकें तो आपकी नासमझी की वजह से दूसरे मूर्ख कैसे हो जाएंगे ?
कृप्या ध्यान दीजिए कि
1. सत्काम जाबालि ऋषि की कथा को हिंदी के प्रतिष्ठित ब्लॉगर पं. अनुराम शर्मा जी की पोस्ट के हवाले से पेश किया गया है। उनकी पोस्ट का लिंक यह है। लिहाज़ा आपको जो कहना हो, उनकी इस पोस्ट पर जाकर कहें-
http://pittpat.blogspot.in/2012_05_01_archive.html

2. मोहन भागवत जी ने भारत और इंडिया का अंतर अपने बयान में ख़ुद ही स्पष्ट कर दिया है कि भारत से तात्पर्य जंगल और गांव हैं और इंडिया से तात्पर्य शहर हैं।
ऐसे में आप भारत और इंडिया से क्या अर्थ लेते हैं ?, यह आपका विचार है न कि मोहन भागवत जी जैसे उदभट् विद्वान का। फिर भी अगर आप करेक्शन करना चाहें तो उनसे पत्राचार करके उन्हें सही अर्थ बता दें कि भारत और इंडिया का सही अर्थ आपने क्या निश्चित किया है ?
आप आगे भी उनका मार्गदर्शन करते रहा करें तो बहुत सी कमियां दूर हो जाएंगी। ज़माना आपका इंतेज़ार कर रहा है। सब मूर्ख हैं। बस एक आप ही के पास अक्ल है।
कमेंट के लिए शुक्रिया .

DR. ANWER JAMAL said...

@ @ डा. श्याम गुप्त जी ! क्या आपको अपनी स्टोरी में झोल नज़र नहीं आता कि सत्यकाम के पिता जी जवानी में ही मर गए थे और जाबाला उनसे उनका गोत्र नहीं पूछ पाईं थीं ?
क्या सत्यकाम के दादा, चाचा और ससुराल के लोगों में से कोई भी जीवित न था ?
सत्यकाम के पिता जी का उपनयन भी किसी पंडित ने ज़रूर किया होगा और वह जिस गुरुकुल में पढ़े होंगे , उनसे भी पूछा जा सकता था कि मेरे मरे हुए पति का गोत्र क्या था ?
आज भी किसी का पति मर जाता है तो क्या उसे उसका गोत्र पता नहीं लग पाता ?
पति के बजाय मां को आज भी स्कूल में अपना नाम लिखाना पड़ता है. बच्चे के बाप का नाम पता न हो तो जो आज करना पड़ता है और प्राचीन भारत में भी यही किया जाता था.
प्राचीन भारत का समाज आज के पश्चिमी समाज से बहुत अधिक उदार था.

Rashid said...

bahut sahi keh rahe hain dr sahab

Zafar said...

Bilkul theek kaha aapne. Ishwar logon ko budhi se kaam lena sikhaye aur in andhvishwason aur adambaron se nikal kar satye ko girhan karne ki prerna de. Param Satye : Ek Ishwar ke siwa koi bhi bhakti le layaq nahin hai. Sab ko kewal usi Ushwar mein aastha aur vishwas rakhna chahiye aur usi ki bhakti, gudgaan aur jaijekar karni chahiye. Aur usi ke adeshon ke anusaar apna jeevan bitana chahiye.

HAKEEM YUNUS KHAN said...

मनमानी लोगों को भाति है लेकिन उसके अंजाम कई बार भयानक भी होते हैं. पुलिस अंजाम भुगतने के बाद आती है. कोर्ट उसे और ज्यादा भुगतवाता है.
बलात्कारी पुलिस और अदालत किसी की नहीं सुनते. अपनी जान की हिफाज़त खुद कर सको तो कर लो.
महिलाओं को आजादी के नाम पे गुमराह कर के उनका शोषण करने का ही एक तरीका है |यदि यह माहिलाओं द्वारा मांगी आजादी होती तो वोह दहेज़ से छुटकारा मांगती, पिता की जायदाद में से उतना हक मांगती जितना भाई को मिलता है | शादी के बाद पिता का घर ना छोड़ने की शर्त रखती इत्यादि |

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