Tuesday, June 11, 2013

आडवाणी की सिद्धांतनिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह ?

यह सवालात उठा रहे हैं मुरारी शरण शुक्ल
क्या राष्ट्रवाद का सिद्धांत जीवन पर्यन्त केवल स्वयं का व्यक्तिगत अहम पोषण करते रहने का मार्ग प्रशस्त करता है ? क्या यह सिद्धांत व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के मार्ग मे उपयोग आने वाला खिलौना मात्र है ? क्या यह राष्ट्रवाद प्रधानमंत्री की कुर्सी प्राप्त करने का अमोघ साबर मंत्र है ? क्या यह सिद्धांत केवल मात्र अपना और अपनों को स्थान दिलाने वाला अत्यंत संकुचित, संकरा, सुरक्षित और अरक्षित सा राजमार्ग है जिस पर अन्य लोगों का चलना प्रतिबंधित है ? क्या यह राष्ट्रवाद परकीयों (जिन्ना, नरेगा)की प्रशंसा और  स्वकियों की उपलब्धियों (अटल सरकार की स्वर्णिम चतुभुज योजना, नदियों को जोड़ने की योजना, सभी बंद हो चुके उद्योगों को नवरत्न की श्रेणी में शामिल हो जाने योग्य बना देने की उपलब्धी, अर्थव्यवस्था को चिर जिवंत संजीवनी प्रदान कर देने की उपलब्धी, पाठ्यक्रमों में सकारात्मक बदलाव की उपलब्धी, महंगाई को पूर्ण नियंत्रित करने की उपलब्धि, आजादी के बाद पहली बार विदेशी कर्ज चुकाने की उपलब्धि, रसोई गैस, चीनी और मोबाइल फ़ोन की बिक्री गली गली में करवा देने की युगांतरकारी उपलब्धी, कारगिल युद्ध की शानदार विजय, जोरदार विदेश निति की जबरदस्त राजनयिक सफलता, सफ़ल परमाणु परिक्षण और भी ऐसी अन्य अनेकों उपलब्धियों) पर लम्बी चुप्पी का पाठ पढाता है ? क्या यह राष्ट्रवाद दुधारी तलवार है जिससे जनाधार विहीन अपने चापलूसों का पालन, पोषण, संवर्धन और जनाधार वाले कद्दावर राष्ट्रवादी नेताओं (इन्दर सिंह नामधारी, कल्याण सिंह, मदनलाल खुराना, बाबूलाल मरांडी, बी एस येदुरप्पा इत्यादी) का पददलन, मानमर्दन करके, निरधार आरोपों की रचना करके पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देना संभव है ? क्या यह राष्ट्रवादी सैद्धांतिक निष्ठा''तातल सयकत वारि विन्दु सम'' अर्थात गर्म रेत पर पड़ते ही जिस प्रकार जल की बुँदे तुरंत वाष्पित होकर उड़ जाती हैं उसी प्रकार अपने मन की बात नहीं पूरी होने पर तुरंत ही अंतर्ध्यान हो जाने वाली क्षणभंगुर इन्द्रधनुषी नीति है ?
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आडवाणी की सिद्धांतनिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह ?

लगता है आडवाणी जी ने अपने राजनितिक जीवन के लिए राष्ट्रवाद की यह नयी परिभाषा गढ़ी थी जिसकी पोल-पट्टी आज सबके सामने खुल गयी है ! इनका राष्ट्रवाद आज एक ही झटके में अंतर्ध्यान हो गया जब इन्हें यह प्रतीत होने लग गया कि अब इनके प्रधानमंत्री बनाने के सपने भाजपा में रहकर पुरे नहीं हो सकते ! इसीलिए इन्होने आज भारत को परम वैभव तक ले जाने के मार्ग का परित्याग कर दिया है ! चलो यह अच्छा भी हुआ की भारत माता का भाल संवारने का सपना दिन-रात देखने वाले हमलोगों को इस छलावे से देर से ही सही मुक्ति तो मिली !

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