Friday, July 22, 2011

अनम को गुज़रे हुए आज एक साल हो गया है Flower Of Jannah

आज के दिन मेरे दोस्त उसके लिए एक नन्हा सा कफ़न लाए थे। ये वही दोस्त थे जो कि उसके लिए ख़ूबसूरत जोड़ा लाते अगर वह बड़ी होती और ...
लेकिन वह इस दुनिया से चली गई। उसके पैदा होने से पहले ही लेडी डाक्टर भी उसे क़त्ल कर देना चाहती थी क्योंकि वह अपाहिज थी शुरू से ही ।
कैसी है यह दुनिया जो अपाहिजों को मार डालती है ?
शिक्षा और आधुनिकता ने लोगों को आखि़र किस मक़ाम पर लाकर खड़ा कर दिया ?
देखिए और सोचिए और हो सके तो बदलिए इस दुनिया को और उससे पहले अपनी सोच को

क्या अपाहिज भ्रूणों को मार देने के बाद भी डाक्टर को मसीहा कहा जा सकता है ? 'Spina Bifida'

11 comments:

शालिनी कौशिक said...

anwar ji ,
ye to hamne bhi mahsoos kiya hai ki aaj ke doctor jitne hriday heen ho rahe hain utna shayad jallad bhi n hon .inke liye aadmi ke jeene marne se koi fark nahi padta ye to keval paisa paisa aur bas paisa hi dekhte hain .

एस.एम.मासूम said...

अनवर साहब यह पोस्ट एक बाप कि मुहब्बत अपनी ओलाद से कितनी हो सकती है साफ़ साफ़ बता रही है. आप के इस दर्द मैं हम आप के साथ हैं लेकिन वक़्त के साथ साथ सब भूलना पड़ता है. सब्र और अल्लाह से दुआ यही मोमिन के लिए दवा है.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

एक दुखद समाचार पढकर आघात लगा.अनवर साहब ने सही कहा कि-मासूम अपाहिज बच्चों को उनकी मांओं के पेट में मार डालने को जायज़ करने वाले उच्च शिक्षित लोग ही हैं। मैंने सुना है कि-उस मालिक से जब दुआ दूसरों के लिए करों तो जरुर पूरी करता हैं. मैं भगवान महावीर स्वामी जी से प्रार्थना करूँगा कि-वह अनवर जमाल खान साहब को अगले दो साल में उनकी बेटी से मिलाए,बेहतर हाल में,अपनी रज़ा के साथ और इस तरह कि फिर कभी उससे निकाह से पहले जुदा न हो।

Anjana (Gudia) said...

Anam ko aap jaise mata-pita mile, sabka pyar mila aur ab wo asmaan mein mehfooz aur khush hai yeh soch kar dil ko tassali milti hai.

Doctor to zindagi diya karte hain... jab bhi Anam ke baare mein padti hoon dil bhar aata hai. Khuda apko aur Anam ki mummy ko tasalli bakshe.

DR. ANWER JAMAL said...

अपंग भ्रूणों की प्रतिनिधि है बेबी अनम
@ जनाब मासूम साहब ! अनम मेरी बेटी थी , उसकी एक हैसियत तो यह है और उसकी इस हैसियत से लगाव भी सिर्फ मुझे ही होगा और इस लगाव की वजह से मुझे रंज होता हुआ देख कर आपने जो सलाह दी है , वह बिलकुल दुरुस्त है और मैं इस पर चलता भी हूँ लेकिन अनम की एक दूसरी हैसियत भी है और वह यह है कि वह अपंग और बीमार भ्रूणों की प्रतिनिधि भी है .
ऐसे भ्रूण जिन्हें इस दुनिया में रोज़ाना क़त्ल किया जा रहा है और उन्हें क़त्ल करने वाला कोई विदेशी आतंकवादी नहीं है बल्कि खुद उनके माँ बाप हैं और मसीहा कहलाने वाले डाक्टर हैं और इनके क़त्ल को क़ानून भी एक जायज़ क़दम मानता है . अगर अनम को भुला दिया गया तो फिर उन अनाम अजन्मे बच्चों के लिए आवाज़ कौन उठाएगा जिन्हें अपंग और बीमार होने के जुर्म में उनकी माँ के पेट में ही क़त्ल किया जा रहा है ?
क्या इस दुनिया को ऐसे ही करने दिया जाए या इसे बताया जाए कि ऐसा करने के बाद तुम अपने मालिक की नज़र में मुजरिम बन चुके हो ?,
तरह तरह की जिन आफतों में तुम गिरफ्तार हो , ये तुम्हारे ऐसे ही कुकर्मों की सज़ाएँ हैं . मालिक की नाफ़रमानी होते देख कर , ज़ुल्म और ज्यादती होते देख कर जो चुप रहेगा वह भी मुजरिमों में ही गिना जाएगा., मैं अपनी बेटी को तो भुला सकता हूँ लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी को नहीं और फिर मैं अपनी प्यारी सी बेटी को भी क्यों भूल जाऊं ?, एक वही बेटी तो है मेरे पूरे घर में जो इस दुनिया से मासूम चली गयी है . मासूमों की याद तो आज तक आप खुद न भुला पाए क्योंकि यह भुलाने की चीज़ ही नहीं है . मासूम ही हमें हमारा फ़र्ज़ याद दिलाते हैं और हमें गुनाह से बचाकर मालिक की सज़ा से बचाते हैं .,
सही बात यह है कि कोई भी मुहब्बत और कोई भी ग़म आदमी के दिल पर इस दर्जा हावी नहीं होना चाहिए कि वह दुनिया से मायूस हो जाए और अपने फ़र्ज़ को अदा न कर पाए.
अल-हम्दु-लिल्लाह मैं इसका ख़याल रखता हूँ और मैं आपकी नसीहत पर अब और बेहतर तरीके से अमल करूँगा.

पोस्ट में दिए गए लिंक पर पूरी तफसील मौजूद है, उसे भी देखा जाना चाहिए.

* शुक्रिया ऐ ग़मगुसार शुक्रिया,
शुक्रिया ऐ चारासाज़ शुक्रिया

'आकुल' said...

यह तो ऐसा ग़ुनाह है जि‍से भगवान् भी क्षमा नहीं करेगा। ईश्‍वर ने हमें जन्‍म देने की नैमत दी है, मृत्‍यु के लि‍ए हक़ कब से दे दि‍या। ऐसे वाक़यात की पूरी तरह तफ़शीस की जानी चाहि‍ए और सि‍द्ध होने पर डॉ0 की सनद को ख़त्‍म कर देना चाहि‍ए, ताकि‍ इस पाक़ पेशे पर दाग़ न लगे। मेरा बेटा रूस में एमबीबीएस कर रहा है, 7 घंटे तक बर्फ के नीचे दबे रहेने के कोल्‍ड बर्निंग केस में एक 5 वर्षीय बच्‍चे को जी जान से 17 घंटे चले ऑपरेशन में बचाये जाने की नायाब कोशि‍श को वह अपने जीवन का सबसे अहम अनुभव मानता है, उसने सेवा के इस ज़ज्‍़बे को सलाम कि‍या है और वचन लि‍या है कि‍ वह हर हाल में जीवन बचायेगा।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आपके दुख को समझ सकता हूँ, पूर्ण सम्वेदना है! काश अनम आज भी हँसती खेलती होती! भगवान क्या करता है और क्यों करता है, हम शायद समझ नहीं सकते मगर इंसानी मायनों में सभ्य समाज वही है जहाँ सक्षम अक्षम को सहारा देने को बढ-चढ कर आगे आते हैं - इसके विपरीत तो जंगल का राज ही हुआ।

सदा said...

इस तरह की सोच बेहद दुखद एवं निंदनीय है ....इनके इस गुनाह की माफी शायद ही मिले ...।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत दुःख हुआ यह जानकर!
--
क्या यह सब करके ही भारत जगदगुरू कहलाएगा?
--
क्या यही विकासशील से विकसित होने का रास्ता है?
--
दिमाग झन्ना उठा है, यह सब सोच-सोच कर!

रविकर said...

इस मिशन में हम और हमारी
शुभकामनाएं आपके साथ है डाक्टर साहब ||

prerna argal said...

डॉ.साहब आपके जीवन के इस दुखद पहलु के बारे मैं जानकार बहुत दुःख हुआ /भगवान् ने आपका और उसका साथ इतना ही बनाया था शायद /इस दुःख मैं हम आपके साथ हैं /भगवान् फिर आपको उससे जल्दी ही मिलाये यहो दुआ है/

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