यूं तेरी यादों की कश्ती है रवां शाम के बाद.
जैसे वीरान जज़ीरे में धुआं शाम के बाद.
चंद लम्हे जो गुजारे थे तेरे साथ कभी
ढूंढ़ता हूं उन्हीं लम्हों के निशां शाम के बाद.
एक-एक करके हरेक जख्म उभर आता है
दिल के जज़्बात भी होते हैं जवां शाम के बाद.
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ग़ज़लगंगा.dg: काटने लगता है अपना ही मकां शाम के बाद:
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और अगर ये लोग तुमसे फरेब करना चाहते है तो ख़़ुदा से पहले ही फरेब कर चुके
हैं तो (उसकी सज़ा में) ख़़ुदा ने उन पर तुम्हें क़ाबू दे दिया और ख़़ुदा तो
बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है
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और अगर ये लोग तुमसे फरेब करना चाहते है तो ख़़ुदा से पहले ही फरेब कर चुके
हैं तो (उसकी सज़ा में) ख़़ुदा ने उन पर तुम्हें क़ाबू दे दिया और ख़़ुदा तो
बड़ा व...






2 comments:
बहुत बढ़िया ।
भाई देवेन्द्र जी-
त्योहारों के बाद सुन्दर गजल पढने को मिली -
शुभकामनायें-
behatarin.....nwinta liye hue prastuti
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