यूं तेरी यादों की कश्ती है रवां शाम के बाद.
जैसे वीरान जज़ीरे में धुआं शाम के बाद.
चंद लम्हे जो गुजारे थे तेरे साथ कभी
ढूंढ़ता हूं उन्हीं लम्हों के निशां शाम के बाद.
एक-एक करके हरेक जख्म उभर आता है
दिल के जज़्बात भी होते हैं जवां शाम के बाद.
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ग़ज़लगंगा.dg: काटने लगता है अपना ही मकां शाम के बाद:
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उज़्बेकिस्तान में हिंदी की समकालीन सांस्कृतिक सेतु-निर्माता: डॉ. नीलुफ़र
ख़ोदजायेवा का भाषा, साहित्य, अनुवाद और भारतविद्या में योगदान
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उज़्बेकिस्तान में हिंदी की समकालीन सांस्कृतिक सेतु-निर्माता:
डॉ. नीलुफ़र ख़ोदजायेवा का भाषा, साहित्य, अनुवाद और भारतविद्या में योगदान
डॉ मनीष कुमार मिश्...






2 comments:
बहुत बढ़िया ।
भाई देवेन्द्र जी-
त्योहारों के बाद सुन्दर गजल पढने को मिली -
शुभकामनायें-
behatarin.....nwinta liye hue prastuti
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