सिलसिले इस पार से उस पार थे.
हम नदी थे या नदी की धार थे?
क्या हवेली की बुलंदी ढूंढ़ते
हम सभी ढहती हुई दीवार थे.
उसके चेहरे पर मुखौटे थे बहुत
मेरे अंदर भी कई किरदार थे.
मैं अकेला तो नहीं था शह्र में
मेरे जैसे और भी दो-चार थे.
खौफ दरिया का न तूफानों का था
नाव के अंदर कई पतवार थे.
तुम इबारत थे पुराने दौर के
हम बदलते वक़्त के अखबार थे.
-----देवेंद्र गौतम
ग़ज़लगंगा.dg: सिलसिले इस पार से उस पार थे
हिन्दी साहित्य में मिथकों की उपस्थिति का समाजशास्त्रीय और वैज्ञानिक अध्ययन
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हिन्दी साहित्य में मिथकों की उपस्थिति का समाजशास्त्रीय और वैज्ञानिक अध्ययन
शोध-आलेख
डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
के. एम. अग...
2 comments:
तुम इबारत थे पुराने दौर के
हम बदलते वक़्त के अखबार थे...sab kuch kah gayi ye panktiyan.....
ek alag soch liye hue kavita....umda
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