एक लम्हा जिंदगी का आते-आते टल गया.
चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.
अब हवा चंदन की खुश्बू की तलब करती रहे
जिसको जलना था यहां पर सादगी से जल गया.
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ग़ज़लगंगा.dg: चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.:
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और ये लोग वहाँ तकिये लगाए हुए (चैन से बैठे) होगें वहाँ (खु़द्दामे बेहिश्त
से) कसरत से मेवे और शराब मँगवाएँगे
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और ये लोग वहाँ तकिये लगाए हुए (चैन से बैठे) होगें वहाँ (खु़द्दामे बेहिश्त
से) कसरत से मेवे और शराब मँगवाएँगे (51)
और उनके पहलू में नीची नज़रों वाली (शरमी...
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