आदरणीय डा. अरविन्द मिश्रा जी का यह कथन हिंदी ब्लॉगर्स के दरम्यान चल रही एक लंबी और आलिमाना बहस का हिस्सा है, जिसे देखा जा सकता है निम्न पोस्ट पर
विनोद दास की कविता में रोज़मर्रा का जीवन, सामाजिक असमानता और प्रतिरोध का
सौंदर्य
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विनोद दास की कविता में रोज़मर्रा का जीवन, सामाजिक असमानता और प्रतिरोध का
सौंदर्य
वस्तु, देह, स्मृति और नागरिकता का पाठ-केंद्रित अध्ययन
डॉ. मनीष क...

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