आदरणीय डा. अरविन्द मिश्रा जी का यह कथन हिंदी ब्लॉगर्स के दरम्यान चल रही एक लंबी और आलिमाना बहस का हिस्सा है, जिसे देखा जा सकता है निम्न पोस्ट पर
जाता हुआ साल
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जाता हुआ साल
किसी पुराने कैलेंडर की तरह
दीवार से उतर रहा है
और कीलों पर
हमारी उम्मीदें टँगी रह जाती हैं।
नया वर्ष
आ गया है पर तुम मेंरे
गए नही...

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