एक लम्हा जिंदगी का आते-आते टल गया.
चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.
अब हवा चंदन की खुश्बू की तलब करती रहे
जिसको जलना था यहां पर सादगी से जल गया.
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ग़ज़लगंगा.dg: चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.:
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लोगों के वास्ते जब (अपनी) रहमत (के दरवाजे़) खोल दे तो कोई उसे जारी नहीं कर
सकता और जिस चीज़ को रोक ले उसके बाद उसे कोई रोक नहीं सकता और वही हर चीज़ पर
ग़ालिब और दाना व बीना हकीम है
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सूरए फातिर (पैदा करने वाला) मक्के में नाजि़ल हुआ और उसकी पैंतालिस (45)
आयतें हैं
खु़दा के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
हर त...






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