Sunday, May 13, 2012

मां The Mother (Urdu Poetry Part 3)


मां The Mother (Urdu Poetry Part 3)
सर झुकाए ग़मज़दा बच्चा इधर आया नज़र
दौड़ कर बच्चे को घर में ख़ुद बुला लाती है मां

हर तरफ़ ख़तरा ही ख़तरा हो तो अपने लाल को
रख के इक संदूक़ में दरया को दे आती है मां

दर नया दीवार में बनता है इस्तक़बाल को
ख़ाना ए काबा के जब नज़्दीक आ जाती है मां

लेने आते हैं जो मौलाना इजाज़त अक्द की
घर में जाती है कभी आंगन में आ जाती है मां

शोर होता है मुबारकबाद का जब हर तरफ़
बेतहाशा शुक्र के सज्दे में गिर जाती है मां

पोंछ कर आंसू दुपट्टे से, छुपा कर दर्द को
ले के इक तूफ़ान बेटी से लिपट जाती है मां

चूम कर माथाा, कभी सर और कभी कभी देकर दुआ
कुछ उसूले ज़िंदगी बेटी को समझाती है मां

होते ही बेटी के रूख्सत मामता के जोश में
अपनी बेटी की सहेली से लिपट जाती है मां

छोड़ कर घर बार जो सुसराल में रहने लगे
अपने उस बेटे की सूरत को तरस जाती है मां

करके शादी दूसरी हो जाए जो शौहर अलग 
ख़ूं की इक इक बूंद बच्चों को पिला जाती है मां

छीन ले शौहर जो बच्चे, दे के बीवी को तलाक़
हाथ ख़ाली, गोद ख़ाली हाय रह जाती है मां

सुबह दर्ज़ी लाएगा कपड़े तुम्हारे वास्ते
ईद की शब बच्चों को ये कह के बहलाती है मां

मर्तबा मां का ज़माना देख ले पेशे ख़ुदा
इस लिए फ़िरदौस से पोशाक मंगवाती है मां

उंगलियां बच्चों की थामे अपने भाई के हुज़ूर
बहरे क़ुरबानी जिगर पारों को ख़ुद लाती है मां

कोई उन बच्चों से पूछे, क्या है शादी का मज़ा
ब्याह की तारीख़ रख कर जिस की मर जाती है मां

हाले दिल जा कर सुना देता है मासूमा को वो
जब किसी बच्चे को अपने क़ुम में याद आती है मां

जब लिपट कर रौज़ा की जाली से रोता है कोई 
ऐसा लगता है कि जैसे सर को सहलाती है मां

भूक जब बच्चों को आंखों से उड़ा देती है नींद
रात भर क़िस्से कहानी कह के बहलाती है मां

सब की नज़रें जेब पर हैं, इक नज़र है पेट पर
देख कर चेहरे को हाले दिल समझ जाती है मां

कम सिनी में जो बिछड़ जाते हैं बच्चे बाप से 
ढूंढने कूफ़ा के बाज़ारों में आ जाती है मां

ज़र्रा ज़र्रा है वहां की ख़ाक का ख़ाके शिफ़ा
झाड़ कर बालों से इतना पाक कर जाती है मां

अपने ही घर के दरो दीवार दुश्मन हों तो फिर 
मार दी जाती है, या तंग आके मर जाती है मां

दिल का जब नासूरा बन जाता है ये ज़ख्मे जहेज़
तेल मिट्टी का छिड़क कर हाय मर जाती है मां

ज़िंदगी दुश्वार कर देता है जब ज़ालिम समाज
ज़हर बच्चों को खिला कर, ख़ुद भी मर जाती है मां

जुज़ ख़ुदा उस दर्द को कोई समझ सकता नहीं
किस लिए आखि़रा चिता की भेंट चढ़ जाती है मां !!

शुक्रिया हो ही नहीं सकता कभी उस का अदा
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है मां

बेकसी ऐसी कि उफ़ , इक बूंद पानी भी नहीं !!
अश्क बहरे फ़ातिहा आंखों में भर लाती है मां

दौड़ कर बच्चे लिपट जाते हैं उस रूमाल से
ले के मजलिस से तबर्रूक घर में जब आती है मां

जाते जाते भी अज़्ज़ादारी ए शाहे करबला
जो मिली ज़ैनब से वो मीरास दे जाती है मां

मुददतों गोदी में ले के, करके मातम शाह का
मजलिसों में बैठने का ढंग सिखलाती है मां

चाहे जब, चाहे जहां कोई करे ज़िक्रे हुसैन
छोड़ कर जन्नत को उस मजलिस में आ जाती है मां

उम्र भर देती है बच्चों को ग़ुलामी का सबक़
अपने बच्चों को वफ़ा के नाम कर जाती है मां

जब तलक ये हाथ हैं हमशीर बेपर्दा न हो
इक बहादुर बावफ़ा बेटे से फ़रमाती है मां

जब सनानी ले के आता है मदीने में बशीर
दोनों हाथों से कमर थामे हुए आती है मां

चारों बेटों की शहादत की ख़बर जिस दम सुनी
अपने पाकीज़ा लहू पर फ़ख़्र फ़रमाती है मां

जिस के टुकड़ों पर पला सारा मदीना मुददतों 
उस की बेटी को हर इक फ़ाक़े पे याद आती है मां

दीन पर जब वक्त पड़ता है तो सेहरे की जगह
बहरे क़ुरबानी कफ़न बच्चों को पहनाती है मां

दोपहर में अपना जो सब कुछ लुटा दे दीन पर
वो बहादुर शेर दिल ख़ातून कहलाती है मां

फ़र्ज़ जब आवाज देता है तो आंसू पोंछ कर
छोड़ कर बच्चों के लाशे शाम को जाती है मां

बेकसी भी चीख़ उठी आखि़र दयारे शाम में 
अधजले कुरते में जब बच्ची को दफ़नाती है मां

किस ने तोड़ी है दिले क़ुरआने नातिक़ में सिनां
ज़ख्मे नेज़ा देख कर सीना पे चिल्लाती है मां

तीर खा कर मुस्कुराता है जो रन में बेज़ुबां
मरहबा कहते हुए सज्दे में गिर जाती है मां

सामने आंखों के निकले गर जवां बेटे का दम 
ज़िंदगी भर सर को दीवारों से टकराती है मां

-रज़ा सिरसवी   
'प्यारी माँ' ब्लॉग पर  

अंदाज ए मेरा: मां..... जाने कहां गई

अंदाज ए मेरा: मां..... जाने कहां गई: मार्च 1973 की तस्‍वीर। जब मैं दो महीने का था.... अपनी मां की गोद में। बगल में मेरा 2 साल का भाई बैठा है। यूं ही ननिहाल में पुराने एलबम पलट...

Saturday, May 12, 2012

पाकिस्तान की रिंकल का साक्षात्कार (Video) Rinkal confirming her conversion to Islam.

ब्लॉग  जगत में पूछा जा रहा है कि 

सिंध पाकिस्तान की एक हिंदू लड़की रिंकल का अपहरण कर के उसे ज़बरदस्ती मुसलमान बना ने कि खबर आज कल ज़ोरों पे चल रही है | पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों में इस कहानी के दो रुख हैं | पहला तो यह कि ज़बरदस्ती इस्लाम कुबूल करवाया और दूसरा यह कि रिंकल ने खुद इस्लाम कुबूल किया |
सच क्या है वो तो वही जानें जो रिंकल से मिल चुके हैं लेकिन रिंकल का साक्षात्कार वाला यह विडियो कहता है कि उसने मर्ज़ी से इस्लाम कुबूल किया है | यह और बात है कि ऐसे साक्षात्कारो पे कितना यकीन किया जाए यह यहाँ बैठ के फैसला करना बहुत ही मुश्किल है |





रिंकल ने मर्ज़ी से यदि इस्लाम कुबूल किया है तब तो वो हुई मुसलमान लेकिन यदि उसके साथ ज़बरदस्ती हुई है तो वो मुसलमान नहीं हुई और कुरान के हुक्म के खिलाफ जाते हुई किसी को मुसलमान बनाने कि कोशिश करना किसी मुसलमान का काम नहीं हों सकता |

इस्लाम में किसी भी लड़की कि शादी ज़बरदस्ती किसी के साथ नहीं करवाई जा सकती और अगर ज़बरदस्ती की  गयी तो निकाह सही नहीं माना जाता |
ऐसे ज़बर्दास्तियाँ राजनीती से प्रेरित तो हों सकती हैं लेकिन इस्लाम से इनका कुछ लेना देना नहीं
अगर यह सच में ज़बरदस्ती है तो इसके खिलाफ सभी हिंदू और मुसलाम दोनों को आवाज़ उठानी चाहिए | और अगर यह ज़बरदस्ती नहीं है तो ऐसी अफवाहों को बढ़ावा भी नहीं देना चाहिए |
Source : http://peyameamn.blogspot.in/2012/05/blog-post.html

श्रीधर राघवन का Interview

श्रीधर राघवन चर्चित लेखक का दिमाग चौबीसों घंटें कहानी पैदा करने वाली मशीन की तरह काम करता है. वे अपने न्यूरॉन्स में दौड़ती कई मेगावाट ऊर्जा को संप्रेषित करना रोक नहीं सकते हैं. वे भी इससे सहमत होंगे कि उनकी बातें कभी खत्म नहीं होती हैं. उनके साथ आप समय बर्बाद नहीं कर सकते हैं. वे जिस क्षण कमरे में आते हैं, उसी क्षण काम की बातों पर आ जातें हैं. यह आप पर निर्भर है कि आप उनकी रफ़्तार से कदम मिला सकते हैं या नहीं. वे लगातार बढ़ते ही जातें हैं- कहानियों की बातें, पसंदीदा फिल्मों की बातें, 70 के दशक की 70 एमएम की शख्सियतों की बातें. वे बारीकी से छोटी-छोटी बातों पर चर्चा करने में खुशी महसूस करते हैं.

मिलिए ज़िन्दादिल श्रीधर राघवन से जिनकी बिजली जैसी उपस्थिति आप पर गहरा प्रभाव छोड़ती है. 42 की उम्र में भी वे पूरे उत्साह से उन फ़िल्मों की बातें कर सकते हैं जो उन्होने अपनी किशोरावस्था में पुणे में देखी थीं. इस लेखक के पास, दस प्रतिशत ऊर्जा हस्तांतरण के नियम (टैन परसेंट लौ ऑफ एनर्जी ट्रांसफ़र) की स्क्रीनराईटिंग के संदर्भ में एक दिलचस्प व्याख्या है. इनके पास सिनेमाघरों में जाकर फ़िल्में देखने से जुड़ी बचपन की कई सारी यादें भी हैं. श्रीधर मानते है कि उनकी प्रतिभा उनके शहर पुणे में स्तिथ दो सिनेमाघरों की फ़िल्मों, यानी अलंकार के मैटिनी शोज़ और अपोलो के रेग्युलर शोज़; के बीच पैदा हई.

वे एक कंप्यूटर विज्ञान स्नातक से पत्रकार बनें. उनकी कहानियाँ उनके कॉलेज के दिनों से ही साइंस टुडे, मिरर और डेबोनर जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहीं थीं. कंप्यूटर साइंस में अपनी डिग्री पूरा करने के बाद, वे मुंबई आये और जेंटलमैन पत्रिका में शामिल हो गए जहां वे मुख्य रूप से अपराध के बारे में लिखते थें. यहाँ उन्होने पाँच साल काम किया. पत्रकारिता के दौरान उन्होने बॉम्बे-टाइम्स और मिडडे में हास्य-कॉलम भी लिखें. फिर उन्होने यूटीवी के इनफ़्लाईट विभाग में काम किया और अंत में, एक स्वतंत्र लेखन की तरफ़ मुड़ गये.

श्रीधर का कैरियर सीआईडी (2001 - 2006) और आहट के साथ शुरू हुआ और उनके इन शोज़ के लिए 600-700 एपिसोड्स लिख चुकने के बाद, ख़ाकी (2004) ने उन्हें एक फ़िल्म-लेखक और थ्रिलर के विशेषज्ञ के रूप में पहचान दिला दी. उसके बाद आई दीवार: लेट्स ब्रिंग आर हीरोज़ होम (2004), अपहरण (2005)- जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, ब्लफ़मास्टर! (2005), फ़ैमिली- टाइज़ ऑफ़ ब्लड (2006) और चांदनी चौक टू चाइना (2009). दम मारो दम (2011) उनकी कलम से निकली नवीनतम और स्टाइलिश कॉप-फ़िल्म (पुलिस पर आधारित फ़िल्म) है.

(प्रस्तुत है उनसे हुआ साक्षात्कार:)
  
श्रीधर राघवन

हमें श्रीधर राघवन नाम के व्यक्ति के बारे में कुछ बताइए.

मैं ४२ साल का हूँ. एक तमिल, लेकिन वास्तव में एक महाराष्ट्रियन हूँ जिसका जन्म पुणे में हुआ. मैं एक लेखक भी हूँ (हँसते हैं)... और क्या कहूं?
मैं शायद बहुत विस्तार में चला जाऊं लेकिन मेरा पहला जुनून ड्रॉइंग या स्कैचिंग था. बचपन में मैं सोचता था कि मुझे आगे चलकर यहीं करना है. फिर वह कहीं पीछे छूट गया. 12 साल की उम्र में मैं अखबारों और साइंस टुडे:2001, मिरर और डेबोनेर जैसी पत्रिकाओं के लिए अपनी कहानियाँ भेजने लगा था. यह 1983 की बात है. उनमें से कुछ छप गयीं और मैं उत्साहित हो गया. मैंने सोचा कि यही वह काम है जो मैं करना चाहता हूँ.

लेकिन जब आप एक तमिल मध्यम वर्ग के पुणे में रहने वाले ब्राह्मण होते हैं, तो आप के पास एक डॉक्टर, या चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने का विकल्प तो होता है पर एक लेखक बनने का नहीं. 80 के दशक में लेखन के बारे में सोचना कोई अव्वल दर्जे की समझदारी की बात नहीं थी. मैंने कंप्यूटर विज्ञान ले लिया. यह भी एक मजाक ही था क्योंकि मैं जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की प्रवेश-परीक्षा के लिए मुंबई आया था और मेरे पिताजी ने कहा कि कंप्यूटर साइंस की परीक्षा भी दे दो. मैंने कहा ठीक है. खुन्नस में आकर मैंने उस मल्टीपल चॉईस परीक्षा के सवालों के जवाब मनमाने ढंग से टिक कर दिए और पांच मिनट के भीतर बाहर आ गया. मैं किसी तरह उस परीक्षा में सातवें या आठवें स्थान पर रहा. मैंने अपने पिता को बताया कि मैंने तो सवालों को देखा भी नहीं था. उन्होंने कहा, "हो सकता है कि यही तुम्हारी किस्मत में हैं" और मैंने इसे मान लिया. हालांकि यह एक अच्छे कैरियर की तरह लग रहा था, पर मेरा दिल इसमें नहीं था. मेरी क्लास ऐसी थी जहां 30 में से 29 छात्र पूरी गंभीरता से शिक्षक को सुनते थें. और मुझे यह सब नकली लगता था. मैं खुद से कहता था "यह सब खत्म हो जायेगा. यह असली ज़िन्दगी नहीं है." लेकिन जब मुझे एहसास हुआ कि वह सब मेरी असल ज़िन्दगी की सच्चाई बनने जा रहा था, तो मैंने फैसला किया कि मैं यह नहीं करना चाहता था.

तब मैंने एक कहानी डेबोनेर पत्रिका को भेजी थी जिसके प्रमुख तब आदिल जसावाला थें. उन्होने मुझे प्रोत्साहन से भरी था एक सुंदर-सी चिट्ठी भेजी जिसने मुझे इतना प्रेरित किया कि मैं सब कुछ छोड़ कर मुंबई आ गया. मैं सीधे उनके पास गया और उन्हें वो चिट्ठी दिखाई. उन्होने मुझे बताया कि वह वास्तव में एक रिजेक्शन- लैटर था. मैंने इसे फिर से पढ़ा और महसूस किया कि दो पेजों में वे केवल विनम्रता से मुझे यही बता रहे थे कि लिखना मेरे बस की बात नहीं थी. लेकिन मैं तो सब कुछ छोड़-छाड़ कर आ गया था और वापस नहीं जा सकता था. तो मैंने कहा कि "चलो, जर्नलिज़्म ही कर लेते हैं." इस तरह मैं पत्रकारिता से जुड़ गया.

मैंने मिड-डे में इंटर्नशिप किया और फिर एक पत्रिका जेंटलमैन से जुड़ गया, जहां मैंने करीब 5 साल तक काम किया. यह बहुत ही मज़ेदार था और मैंने इससे बहुत कुछ सीखा. यह एक शानदार अनुभव था क्योंकि मैं हमेशा से ही, बल्कि आज भी, एक बड़बड़ाने वाला, शर्मीला और नर्वस-सा इंसान हूँ. पर जिस पल आप एक पत्रकार बनते हैं, आपको आग में झोंक दिया जाता है. आपको पुलिस स्टेशन जाकर एक इंस्पेक्टर से पूछना होता है "क्या आपने उस आदमी को मारा था?" इसके लिए हिम्मत और आत्म विश्वास चाहिए. आपको लोगों से कठोर सवाल पूछने होते हैं. लेकिन धीरे - धीरे यह आपके पूर्वाग्रहों को मिटाने में मदद करता है. तो पत्रकारिता के 4-5 सालों ने मेरी वास्तव में बड़ी मदद की.

इस दौरान मुझे लगने लगा कि मैं आपको खर्च कर रहा हूँ. मुझे लगा कि जो भी मैं लिख रहा था उसका महत्व 2-3 साल में खत्म होने वाला था. तो मैं यूटीवी में शामिल हो गया. मैंने एक अलग तरह के विभाग में काम किया जिसका नाम था इनफ़्लाईट. वहाँ छह- आठ महीनों के दौरान मैंने दो महीने एडिटिंग में, दो महीने कैमरा में और दो-तीन महीने प्रॉडक्शन में बिताये और सब कुछ सीख लिया. यह मेरे लिए एक नि: शुल्क, पैसे देने वाला फ़िल्म-कोर्स बन गया जहां मुझे फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को देखने का मौका मिला. छह- आठ महीनों के बाद मुझे विश्वास हो गया कि अब अगर मैं एक लेखक के रूप में काम शुरू करूंगा तो मैं इसे कर पाऊंगा.

इसके बाद मैं कुंदन शाह से मिला जिन्हें मैं जानता भी नहीं था. वे उन कुछ लोगों में से हैं जिनका मैं सम्मान करता हूँ और इसीलिए मैं उनसे सीखना चाहता था. और कुंदन हैं भी बड़े सज्जन. वे किसी को मना नहीं करते. आप उसने कुछ भी निवेदन कीजिये और वे कहेंगे "चलो, ठीक है." तो मैं उन्हें असिस्ट करने लगा. मैंने कुंदन से वास्तविक लेखन के नियमों के बारे में बहुत कुछ सीखा. उसके बाद मेरी अंजुम (राजाबली) से मुलाकात हुयी.

कुछ समय बाद मैंने मेरे एक दोस्त के लिए एक पायलट एपिसोड लिखा क्योंकि मैं वैसे भी हर समय लिखने की कोशिश कर रहा था. उन दिनों में, पायलट बनाना काफी प्रचलित था. हर कोई एक पायलट एपिसोड बना रहा था. हालांकि हमारे पायलट को स्वीकृति नहीं मिली पर हैरत की बात हुई कि अंजुम, जो बीआई टीवी (यह एक चैनल था जो दुर्भाग्य से बंद हो गया) के लिए काम रहे थें; ने इसे देखा. उन्हें मेरा काम पसंद आया और उन्होने मुझसे पूछा "किसी और के लिए इसी जौन्रे में कुछ लिखना चाहोगे?" मैंने कहा "हाँ, कौन?" उन्होने कहा "बीपी सिंह!" मैंने कहा "बीपी सिंह... ?"
उस समय मैं टीवी के बारे में ज़्यादा नहीं जानता था. तो मैं घर आया और अपने भाई से पूछा, जो फ़िल्मों के बारे में मेरा ऍनसायक्लोपीडिया हैं. उन्होंने कहा "बीपी सिंह गज़ब के आदमी है! क्या तुमने एक शून्य शून्य देखा है?" मैंने कहा "हाँ," क्यूंकि मैं एक महाराष्ट्रियन हूं, इसलिए मैं मराठी जानता हूँ. मुझे नहीं पता था कि उन्होने इसे बनाया था. मेरे भाई ने कहा "जो कुछ भी लिखने के बारे में सीखा जा सकता है वह तुम इस आदमी से सीख लोगे. वे महान हैं." मैंने जाकर श्री सिंह से मुलाकात की. प्रारंभ में, वे मुझे लेकर संशय में थें कि मैं यह कर पाऊंगा या नहीं. वे एक शो आहट बना रहे थें और उन्होने पूछा "क्या तुम यह लिख पाओगे?" मैंने 20-21 की उम्र के आत्मविश्वास से भरकर कहा "ज़रूर!" उन्होने आगे कहा कि "हर हफ़्ते एक कहानी लिखनी पड़ेगी. क्या यह तुमसे हो पायेगा?" मैंने कहा, "हाँ, मैं कर लूँगा." हालांकि वे मुझे लेकर निश्चिन्त नहीं थें पर हमारा साथ अच्छा निभा. मैंने 7-8 साल सीआईडी और फिर आहट लिखा. इस तरह मैं एक लेखक बन गया.

जब मैं कुंदन के साथ काम कर रहा था, तो उन्होने मुझे ऑर्गेनिक राईटिंग के बारे में सिखाया. मेरा तरीका हमेशा से सीधा-सपाट रहा है. मैं हमेशा से प्लॉट के साथ मज़बूत रहा हूँ. हालांकि मुझे लगता है कि मैं कैरेक्टर के साथ उतना मज़बूत नहीं हूँ. तो कुंदन कहते, "चलो इस पर काम करें" और मैं खटाखट कुछ लिख कर उन्हें दे देता. प्लॉट पौइन्ट्स, थ्री एक्ट्स; सब मसाला उसमें होता था. कुंदन इसे देखते और कहते हैं "यह नहीं. ऐसे नहीं." मुझे समझ में नहीं आता था क्यूंकि मेरे मुताबिक सब कुछ मेरी स्क्रिप्ट में मौजूद हुआ करता था. तब कुंदन ने मुझे एक अमूल्य टिप दी थी. मुझे नहीं लगता कि यह बात अब उन्हें याद भी है.

उन्होंने मुझसे कहा, "अपना पूरा प्लॉट ड्राफ्ट लिखो जैसे तुम चाहते हो. अब यह एक वर्जन है, इसके बारे में भूल जाओ. भूल जाओ कि तुम्हारी कहानी में क्या होता है. अब तुम कहानी के किरदार बन जाओ और इसे फिर से देखो. तुम वह इंसान बनो जिसके साथ यह कहानी घट रही है. अब जो तुम्हारे प्लॉट ड्राफ्ट में हो रहा था उनमें से कुछ प्रारंभिक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना शुरू करो. अगर किरदार एक वास्तविक इंसान हो तो तब उसकी यात्रा क्या होगी? अब हुआ यह है कि पहले वाला वर्जन कहानी का एक इनौर्गेनिक प्लॉट ड्राफ्ट था और दूसरा वर्जन एक ऑर्गेनिक ड्राफ्ट है. जिस दिन ये दोनों एक ही दिशा में जाने लगेंगे उस दिन तुम्हारे पास एक अच्छी फ़िल्म होगी!" चाहे वे इसे ऑर्गेनिक-इनौर्गेनिक कहा करते हो पर मेरे लिए यह एक शानदार पाठ था. मैं अभी भी इससे सीखने की कोशिश कर रहा हूँ.

जब मैं बीपी के साथ काम किया तो मुझे मेरा दूसरा सबसे महत्वपूर्ण सबक मिला. बीपी 'बौइलिंग अ सीन' के बारे में कहा करते थे और मैं सोचता "इसका क्या मतलब?" असल में यह दूध के उबलने के समान है. जब आप चाय के लिए दूध गर्म करते हैं तब एक ऐसा वक्त आता है जहा दूध भयंकर उबल रहा है पर अभी उफ़ना नहीं है. यदि आप इससे ज्यादा गर्म कर दें तो दूध बाहर निकल आएगा और कम रखें तो यह फ्लैट हो जाएगा. वह सही बिंदु आपको ढूंढना होता है जहां दूध उबल भी रहा है और बाहर भी नहीं आया है. इसका मतलब है किसी सीन की अधिकतम नाटकीय संभावना का इस्तेमाल करना. सभी महान निर्देशक जिन्हें हम याद करते हैं जैसे राज कपूर या विजय आनंद; वे सभी जानते थें कि कैसे एक दृश्य से ज़्यादा से ज़्यादा ड्रामा निचोड़ा जाता है.

ज्वैल थीफ़ को लीजिये. एक दृश्य है जहां किसी पार्टी में देव आनंद के पास एक औरत आती है और कहती "मैं तुम्हारी मंगेतर हूँ" और वे इनकार करते हैं. तब उस औरत का भाई (अशोक कुमार) आता है और कहता है "बेशक, तुम ही इसके मंगेतर हो." यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण दृश्य है. इसे फिर से देखें अगर आप यह भूल गए हैं. यह दृश्य छोटी-छोटी चीज़ों को उठाकर शानदार ड्रामा पैदा करता है. कागज़ पर चाहे यह छोटा ही रहा हो पर परदे पर यह बेहतर से और बेहतर होता चला जाता है. आज कोई भी लेखक इस दृश्य को फिर से लिख सकता है, लेकिन वह उस ऊंचाई पर नहीं जा सकता जहां श्री विजय आनंद इसे ले गये थें. इसे ही 'बौइलिंग अ सीन' कहा जाता है. अगर आपके पास इस तरह के 60-100 दृश्य हैं तो आपके हाथ में एक महान फ़िल्म है.

आपने फिल्मों के लिए लिखना कैसे शुरू किया?
मैं एक सफल टेलीविजन लेखक था. मैंने सीआईडी और आहट के 600-700 एपिसोड्स लिखें हैं और सच कहूं तो मुझे इसमें बहुत आनंद भी आया था. एक स्टोरीटैलर के रूप में आपके दिमाग में सैकड़ों बातें घूमती हैं जिन्हें बाहर निकालना ज़रूरी हो जाता है. टीवी ने ऐसा करने में मेरी मदद की. और आपको तुरंत प्रतिक्रियायें भी मिल जाती हैं. आप आज लिखते हैं, एक सप्ताह बाद उसकी शूटिंग हो रही होती है और उसके अगले हफ़्ते आपको रेटिंग्स पता लग जाती हैं!

लेकिन पत्रकारिता की तरह यहाँ भी खर्च हो जाने का एक डर था. मुझे महसूस होता था कि दो साल के बाद इस सब को कोई देखेगा ही नहीं. मानो आप बल्ला लेकर क्रिकेट के मैदान में आये हैं और वहाँ कुछ है ही नहीं.
Source : http://www.fwa.co.in/HINDI/SitePages/From-Film-Desk-ShridharRaghavan.aspx

Friday, May 11, 2012

ब्लॉगर डॉ. रुपेश श्रीवास्तव नहीं रहे



भड़ास के जनक, आयुर्वेदाचार्य डॉ. रुपेश श्रीवास्तव.


ने चर्चामंच पर अपनी चर्चा में यह लिंक दिया है.

यू ट्यूब की बफरिंग से छुटकारा

ने चर्चामंच पर अपनी चर्चा में यह लिंक दिया है.

यू ट्यूब की बफरिंग से छुटकारा पाइए.

कई बार हम यू ट्यूब पर कोई उपयोगी वीडियो देखने लगते हैं ,तो इसके बफरिंग करने की वजह से परेशां हो जाते हैं.और आखिर वो वीडियो देखना ही छोड़ देते हैं.यू ट्यूब ऐसी वेबसाईट है जहाँ पर हर तरह के वीडियोज देखने को मिल जाते हैं.ख़ास कर ब्लोगिंग टिप्स ,और कंप्यूटर की समस्याओं के समाधान आपको वीडियो में देखने को भी मिल जाते हैं.ऐसे में जब की हम यू ट्यूब पर वीडियो देख रहे हों ,और ये बहुत ज्यादा बफरिंग करे ,यानि रुक रुक कर चले तो हमारा मूड ऑफ़ हो जाता है.आइये आज हम जानते हैं की यू ट्यूब के वीडियोज की बफरिंग से किस तरह छुटकारा मिल सकता है.और हम आसानी से बिना रुके टीवी की तरह यू ट्यूब वीडियोज देख सक..

Thursday, May 10, 2012

शारीरिक सम्बन्ध Sexual Relationship

सीनियर ब्लागर जनाब मासूम साहब कहते हैं कि

जैसे शरीर में खाने कि भूख होती है वैसे ही शरीर में सेक्स को भी भूख होती है | इसकी भी एक उम्र होती है | कुछ साल तो ऐसा युवा अपने को दूसरी बातों में मसरूफ रख के इसे रोक पाता है क्यों कि उस समय यह भूख उतनी तेज नहीं होती लेकिन एक उम्र आ जाती हैं जब इसे रोकना  आसान नहीं हुआ करता |ऐसे में इंसान फितरत के अनुसार अपनी इस भूख को मिटाने  के रास्ते तलाशना शुरू कर देता है |
आज के युग में शादियाँ होती हैं देर से और युवा को कम से कम १० -१५ वर्ष इस भूख को सहन करना पड़ता है | लोग अजीब अजीब हल निकल लेते हैं इस भूख को खत्म करने का और इन्तेज़ार किया करते हैं कब उनको भी एक साथी मिले | आज के खुले माहौल में युवाओं से यह आशा करना कि वो सब्र करेंगे बेवकूफी के सिवाए कुछ भी नहीं है | हाँ बहुत से ऐसे हैं जो सब्र करते हैं और सही वक्त का सालों इन्तेज़ार कर लिया करते हैं | ऐसे लोगों कि संख्या दिन- ब -दिन अब कम होती जा रही है |आज के खुले माहौल में तो यह और भी मुश्किल होता जा रहा है |
इसका कोई हल हमें निकलना तो चाहिए | हाथ पे हाथ धरे बैठने से या यह तय कर लेने से  कि हमें तो सेक्स कि  आवश्यकता पूरी करने के लिए अधेड उम्र में भी एक पत्नी चाहिए लेकिन हमारी जवान ओलादों को इसकी आवश्यकता नहीं | वो सब्र करेंगे जैसे ख्यालात  समस्या से भागने के सिवाए कुछ भी  नहीं है | समस्या से भागने से समस्या हल नहीं हो जाती और न ही उससे सच झूट में बदल जाता |

पूरी पोस्ट यहाँ देखें :

चलो बहती गंगा में हाथ मैं भी धो लूँ |



Tuesday, May 8, 2012

अंदाज ए मेरा: ...वरना नहीं मिलेगी माफी!

अंदाज ए मेरा: ...वरना नहीं मिलेगी माफी!: बारह साल। ढाई बार पीएससी परीक्षा! वह भी अधर में! छत्तीसगढ़ में सरकार की नाकामी का यह बड़ा उदाहरण है। साथ ही यह बताने के लिए भी काफी है कि...

Sunday, May 6, 2012

ग़ज़लगंगा.dg: जाने किस-किस की आस होता है

जाने किस-किस की आस होता है.
जिसका चेहरा उदास होता है.

उसकी उरियानगी पे मत जाओ 
अपना-अपना लिबास होता है.

एक पत्ते के टूट जाने पर 
पेड़ कितना उदास होता है.

अपनी तारीफ़ जो नहीं करता 
कुछ न कुछ उसमें खास होता है.

खुश्क होठों के सामने अक्सर 
एक खाली गिलास होता है.

हम खुलेआम कह नहीं सकते 
बंद कमरे में रास होता है.

वो कभी सामने नहीं आता 
हर घडी आसपास होता है.

----देवेंद्र गौतम 

ग़ज़लगंगा.dg: जाने किस-किस की आस होता है:

'via Blog this'

रहस्य-रोमांच: कहानी अतृप्त आत्माओं की-1

Saturday, May 5, 2012

अंदाज ए मेरा: ‘यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला...!’

अंदाज ए मेरा: ‘यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला...!’:  ‘फक्र है हमें कि हमने अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए अपनी जान दे दी। हम एक पल भी नहीं डिगे और हमने वो काम अपनी आखिरी सांस तक करने की...

Thursday, May 3, 2012

अंदाज ए मेरा: क्या समझौता? कैसी शांति? कैसी रिहाई?

अंदाज ए मेरा: क्या समझौता? कैसी शांति? कैसी रिहाई?: सरकार ढोल पीट रही है कि उसने सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन की रिहाई का रास्ता आखिर तय कर लिया। सब कुछ ठीक रहा तो गुरूवार को मेनन सुरक...

Tuesday, May 1, 2012

ईनामी ब्लौगर अविनाश वाचस्पति की चर्चित रचना

चर्चित ब्लौगर  अविनाश वाचस्पति  बता रहे हैं उभार के प्रकार।
जिस पर कुछ ब्लॉगर्स आपत्ति जता रहे हैं .
देखिये 

उभार, भार, प्रभार : नहीं कुछ है बेकार

>> सोमवार, 30 अप्रैल 2012


इस पर  शिवम् मिश्रा की  टिप्पणी 
शिवम् मिश्रा 30 अप्रैल 2012 11:39 am
विजय जी इतनी बड़ी गलतफहमी साथ ले कर मत चलिए जो हिन्दी साहित्य अगर इन जैसे के भरोसा रहा तो फिर हो लिया उसका भी कल्याण ! कल तक यह बड़ी बड़ी बाते कर रहे थे और देख लीजिये आज ...

शिवम् मिश्रा 30 अप्रैल 2012 2:52 pm
"मुझ पर आप सारे कानून और नीति नियम थोपना चाहते हैं परंतु चिकनी चमेलियों पर नहीं।"

अच्छा तो अब हिन्दी ब्लॉग जगत की महिलाएं इस नाम से जानी जाएंगी ... वाह वाह ... क्या बात है ... सच मे केवल यह ही रह गया था ... यह करेंगे भला हिन्दी साहित्य और हिन्दी ब्लोगिंग का ... थू है ऐसे विचार पर ... गेट वेल सून !

Breaking News साहित्य का बलात्कार - Vandana Gupta

साहित्य का बलात्कार आखिर हो ही गया .
यह कहना है वंदना गुप्ता जी का .
देखिये उनकी कविता और बताइए कौन है यह बलात्कारी ?
तलाश कीजिये बलात्कार करने वाले को और उसकी वाह वाह करने वालों को .

‘ब्लॉग की ख़बरें‘

1- क्या है ब्लॉगर्स मीट वीकली ?
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_3391.html

2- किसने की हैं कौन करेगा उनसे मोहब्बत हम से ज़्यादा ?
http://mushayera.blogspot.com/2011/07/blog-post_19.html

3- क्या है प्यार का आवश्यक उपकरण ?
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_18.html

4- एक दूसरे के अपराध क्षमा करो
http://biblesmysteries.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

5- इंसान का परिचय Introduction
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/07/introduction.html

6- दर्शनों की रचना से पूर्व मूल धर्म
http://kuranved.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

7- क्या भारतीय नारी भी नहीं भटक गई है ?
http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html

8- बेवफा छोड़ के जाता है चला जा
http://kunwarkusumesh.blogspot.com/2011/07/blog-post_11.html#comments

9- इस्लाम और पर्यावरण: एक झलक
http://www.hamarianjuman.com/2011/07/blog-post.html

10- दुआ की ताक़त The spiritual power
http://ruhani-amaliyat.blogspot.com/2011/01/spiritual-power.html

11- रमेश कुमार जैन ने ‘सिरफिरा‘ दिया
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html

12- शकुन्तला प्रेस कार्यालय के बाहर लगा एक फ्लेक्स बोर्ड-4
http://shakuntalapress.blogspot.com/

13- वाह री, भारत सरकार, क्या खूब कहा
http://bhadas.blogspot.com/2011/07/blog-post_19.html

14- वैश्विक हुआ फिरंगी संस्कृति का रोग ! (HIV Test ...)
http://sb.samwaad.com/2011/07/blog-post_16.html

15- अमीर मंदिर गरीब देश
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/blog-post_18.html

16- मोबाइल : प्यार का आवश्यक उपकरण Mobile
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/mobile.html

17- आपकी तस्वीर कहीं पॉर्न वेबसाइट पे तो नहीं है?
http://bezaban.blogspot.com/2011/07/blog-post_18.html

18- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम अब तक लागू नहीं
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/blog-post_19.html

19- दुनिया में सबसे ज्यादा शादियाँ करने वाला कौन है?
इसका श्रेय भारत के ज़ियोना चाना को जाता है। मिजोरम के निवासी 64 वर्षीय जियोना चाना का परिवार 180 सदस्यों का है। उन्होंने 39 शादियाँ की हैं। इनके 94 बच्चे हैं, 14 पुत्रवधुएं और 33 नाती हैं। जियोना के पिता ने 50 शादियाँ की थीं। उसके घर में 100 से ज्यादा कमरे है और हर रोज भोजन में 30 मुर्गियाँ खर्च होती हैं।
http://gyaankosh.blogspot.com/2011/07/blog-post_14.html

20 - ब्लॉगर्स मीट अब ब्लॉग पर आयोजित हुआ करेगी और वह भी वीकली Bloggers' Meet Weekly
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/bloggers-meet-weekly.html

21- इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ
http://www.sahityapremisangh.com/2011/07/blog-post_3678.html

22- इसलाम में आर्थिक व्यवस्था के मार्गदर्शक सिद्धांत
http://islamdharma.blogspot.com/2012/07/islamic-economics.html

23- मेरी बिटिया सदफ स्कूल क्लास प्रतिनिधि का चुनाव जीती
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/blog-post_2208.html

24- कुरआन का चमत्कार

25- ब्रह्मा अब्राहम इब्राहीम एक हैं?

26- कमबख़्तो ! सीता माता को इल्ज़ाम न दो Greatness of Sita Mata

27- राम को इल्ज़ाम न दो Part 1

28- लक्ष्मण को इल्ज़ाम न दो

29- हरेक समस्या का अंत, तुरंत

30-
अपने पड़ोसी को तकलीफ़ न दो
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साहित्य की ताज़ा जानकारी

1- युद्ध -लुईगी पिरांदेलो (मां-बेटे और बाप के ज़बर्दस्त तूफ़ानी जज़्बात का अनोखा बयान)
http://pyarimaan.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html

2- रमेश कुमार जैन ने ‘सिरफिरा‘ दिया
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html

3- आतंकवादी कौन और इल्ज़ाम किस पर ? Taliban
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/taliban.html

4- तनाव दूर करने की बजाय बढ़ाती है शराब
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html

5- जानिए श्री कृष्ण जी के धर्म को अपने बुद्धि-विवेक से Krishna consciousness
http://vedquran.blogspot.com/2011/07/krishna-consciousness.html

6- समलैंगिकता और बलात्कार की घटनाएं क्यों अंजाम देते हैं जवान ? Rape
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/07/rape.html

7- क्या भारतीय नारी भी नहीं भटक गई है ?
http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html

8- ख़ून बहाना जायज़ ही नहीं है किसी मुसलमान के लिए No Voilence
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/07/no-voilence.html

9- धर्म को उसके लक्षणों से पहचान कर अपनाइये कल्याण के लिए
http://charchashalimanch.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

10- बाइबिल के रहस्य- क्षमा कीजिए शांति पाइए
http://biblesmysteries.blogspot.com/2011/03/blog-post.html

11- विश्व शांति और मानव एकता के लिए हज़रत अली की ज़िंदगी सचमुच एक आदर्श है
http://dharmiksahity.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

12- दर्शनों की रचना से पूर्व मूल धर्म
http://kuranved.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

13- ‘इस्लामी आतंकवाद‘ एक ग़लत शब्द है Terrorism or Peace, What is Islam
http://commentsgarden.blogspot.com/2011/07/terrorism-or-peace-what-is-islam.html

14- The real mission of Christ ईसा मसीह का मिशन क्या था ? और उसे किसने आकर पूरा किया ? - Anwer Jamal
http://kuranved.blogspot.com/2010/10/real-mission-of-christ-anwer-jamal.html

15- अल्लाह के विशेष गुण जो किसी सृष्टि में नहीं है.
http://quranse.blogspot.com/2011/06/blog-post_12.html

16- लघु नज्में ... ड़ा श्याम गुप्त...
http://mushayera.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html

17- आपको कौन लिंक कर रहा है ?, जानने के तरीके यह हैं
http://techaggregator.blogspot.com/

18- आदम-मनु हैं एक, बाप अपना भी कह ले -रविकर फैजाबादी

19-मां बाप हैं अल्लाह की बख्शी हुई नेमत

20- मौत कहते हैं जिसे वो ज़िन्दगी का होश है Death is life

21- कल रात उसने सारे ख़तों को जला दिया -ग़ज़ल Gazal

22- मोम का सा मिज़ाज है मेरा / मुझ पे इल्ज़ाम है कि पत्थर हूँ -'Anwer'

23- दिल तो है लँगूर का

24- लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी - Allama Iqbal

25- विवाद -एक लघुकथा डा. अनवर जमाल की क़लम से Dispute (Short story)

26- शीशा हमें तो आपको पत्थर कहा गया (ग़ज़ल)

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